
स्कूल प्राचार्यों को रोज 2 पीरियड पढ़ाने का आदेश (Photo Source- Patrika File Photo)
Principal Teaching Order: छत्तीसगढ़ में सरकारी स्कूलों के प्राचार्यों की जिम्मेदारियों को लेकर स्कूल शिक्षा विभाग ने बड़ा निर्देश जारी किया है। विभाग ने हाई और हायर सेकेंडरी स्कूलों के प्राचार्यों को प्रशासनिक और वित्तीय कार्यों के साथ-साथ रोजाना कम से कम दो पीरियड पढ़ाने के निर्देश दिए हैं। स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव डॉ. कमलप्रीत सिंह की ओर से 9 सितंबर को जारी आदेश में इस व्यवस्था को तत्काल प्रभाव से लागू करने के निर्देश दिए गए हैं।
विभाग ने संयुक्त संचालकों और जिला शिक्षा अधिकारियों को आदेश का गंभीरता से पालन सुनिश्चित कराने को कहा है। वहीं, इस फैसले के सामने आने के बाद छत्तीसगढ़ प्राचार्य एसोसिएशन ने इसका विरोध शुरू कर दिया है। एसोसिएशन का कहना है कि प्राचार्यों पर पहले से ही प्रशासनिक और विभागीय काम का काफी दबाव है। ऐसे में बिना मौजूदा व्यवस्थाओं को सुधारे अतिरिक्त अध्यापन की जिम्मेदारी देना व्यावहारिक नहीं है।
स्कूल शिक्षा विभाग के आदेश के अनुसार हाई और हायर सेकेंडरी स्कूलों के प्राचार्यों को अब केवल प्रशासनिक और वित्तीय जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं रहना होगा। उन्हें रोजाना कम से कम दो कालखंड यानी पीरियड में अध्यापन कार्य भी करना होगा। विभाग का उद्देश्य स्कूलों में शैक्षणिक गतिविधियों को मजबूत करना और प्राचार्यों को सीधे अध्यापन व्यवस्था से जोड़ना बताया जा रहा है। आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि प्राचार्यों के साथ-साथ स्कूल के अन्य कर्मचारियों के बैठने की व्यवस्था भवन की संरचना और निर्धारित कक्षों के अनुसार होनी चाहिए।
विभाग ने स्कूलों में कमरों के इस्तेमाल को लेकर भी निर्देश दिए हैं। आदेश के मुताबिक कक्षाओं को कार्यालय के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। यदि स्कूल भवन में बड़े कमरे उपलब्ध हैं तो उनका उपयोग अध्यापन कार्य के लिए किया जाना चाहिए। प्राचार्य, लिपिक और अन्य कर्मचारियों के बैठने की व्यवस्था निर्धारित स्थानों पर करने के निर्देश दिए गए हैं। विभाग का मानना है कि इससे स्कूल की शैक्षणिक व्यवस्था बेहतर होगी और उपलब्ध भवन का इस्तेमाल भी व्यवस्थित तरीके से किया जा सकेगा।
विभाग के इस आदेश का छत्तीसगढ़ प्राचार्य एसोसिएशन ने विरोध किया है। एसोसिएशन के प्रांतीय संयोजक अनिल शुक्ला ने कहा कि प्राचार्यों पर पहले से ही स्कूल संचालन से जुड़े कई प्रशासनिक और विभागीय दायित्व हैं। ऐसे में दो पीरियड पढ़ाने के आदेश से पहले स्कूलों में मौजूद मूलभूत समस्याओं को दूर किया जाना चाहिए।
एसोसिएशन ने अपनी आपत्तियों में स्कूलों में लंबे समय से कर्मचारियों की कमी का मुद्दा भी उठाया है। संगठन के अनुसार प्रदेश के कई स्कूलों में पिछले करीब 10 वर्षों से चपरासी और लिपिक जैसे जरूरी कर्मचारियों की कमी बनी हुई है। ऐसे में प्रशासनिक कामों का बड़ा हिस्सा भी प्राचार्यों के जिम्मे आ जाता है।
एसोसिएशन ने स्कूलों में विषयवार शिक्षकों की कमी को भी गंभीर समस्या बताया है। रमसा से स्वीकृत कई हाई स्कूलों में संस्कृत व्याख्याताओं की कमी का मुद्दा उठाया गया है। वहीं स्वामी आत्मानंद स्कूलों में भी कई विषयों के व्याख्याताओं की कमी होने की बात कही गई है। संगठन का कहना है कि जब स्कूलों में विषय शिक्षकों की पर्याप्त उपलब्धता नहीं है और प्राचार्य पहले से प्रशासनिक कार्यों में व्यस्त हैं, तब उन्हें अतिरिक्त अध्यापन कार्य सौंपने से व्यवस्था पर और दबाव पड़ सकता है।
प्राचार्य एसोसिएशन ने वरिष्ठ प्राचार्यों को मिलने वाले वेतनमान और समयमान वेतनमान से जुड़े मामलों का भी उल्लेख किया है। संगठन के अनुसार कई वरिष्ठ प्राचार्यों को प्रथम और द्वितीय समयमान वेतनमान का लाभ अब तक नहीं मिल पाया है। इसके अलावा सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले भुगतान और अन्य प्रकरणों के निपटारे में देरी की समस्या भी बताई गई है। एसोसिएशन का कहना है कि इन मामलों का समाधान किए बिना प्राचार्यों पर नई जिम्मेदारियां डालना उचित नहीं है।
प्राचार्य एसोसिएशन ने अधिकारियों की पदस्थापना और कार्यप्रणाली को लेकर भी सवाल उठाए हैं। संगठन के अनुसार कई जगह कनिष्ठ प्राचार्यों को जिला शिक्षा अधिकारी या संयुक्त संचालक जैसे पदों की जिम्मेदारी दी जा रही है, जबकि कनिष्ठ व्याख्याताओं को विकासखंड शिक्षा अधिकारी की जिम्मेदारी मिल रही है। एसोसिएशन ने इस स्थिति को लेकर भी आपत्ति जताई है कि कई जगह प्राचार्यों को अपने से कनिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों के तहत काम करना पड़ रहा है। संगठन का कहना है कि इससे स्कूल प्रशासन की कार्यप्रणाली प्रभावित होती है।
प्राचार्य एसोसिएशन ने स्कूलों में टाइम टेबल बनाने और परीक्षा संबंधी व्यवस्थाओं में प्राचार्यों की भूमिका सीमित किए जाने का मुद्दा भी उठाया है। संगठन के मुताबिक प्राचार्यों से स्कूल की प्रशासनिक जिम्मेदारियां तो पूरी तरह निभाने की अपेक्षा की जाती है, लेकिन कई मामलों में उन्हें जरूरी अधिकार नहीं दिए जाते। इसके अलावा स्कूलों में अलग-अलग प्रकार के समय निर्धारण, स्कूल समय समाप्त होने के बाद भी ऑनलाइन जानकारी उपलब्ध कराने का दबाव और सभी प्राचार्यों को आहरण एवं संवितरण अधिकारी यानी DDO की शक्तियां नहीं मिलने जैसी समस्याओं का भी उल्लेख किया गया है।
एसोसिएशन ने यह भी कहा है कि प्राचार्यों के पास स्कूल संचालन की जिम्मेदारी तो है, लेकिन कई मामलों में अनुशासनात्मक कार्रवाई से जुड़े पर्याप्त अधिकार नहीं हैं। किसी कर्मचारी का वेतन रोकने, वेतनवृद्धि रोकने या निलंबन जैसी कार्रवाई के अधिकारों को लेकर भी संगठन ने अपनी नाराजगी जताई है। इसके साथ ही कुछ स्थानों पर कलेक्टर स्तर पर प्राचार्यों को फटकार या अपमानित किए जाने की शिकायत भी एसोसिएशन ने रखी है। संगठन का कहना है कि प्राचार्यों को जिम्मेदारी के साथ जरूरी अधिकार और सम्मान भी मिलना चाहिए।
प्राचार्य एसोसिएशन के प्रांतीय संयोजक अनिल शुक्ला ने संकेत दिया है कि यदि सरकार तक अपनी बात प्रभावी तरीके से पहुंचाने की जरूरत पड़ी तो संगठन जिला स्तर के प्रतिनिधियों को रायपुर बुला सकता है। इसके लिए छुट्टी के दिन बैठक आयोजित करने की तैयारी की जा सकती है। एसोसिएशन का कहना है कि वह सरकार के सामने प्राचार्यों की समस्याओं को एक साथ रखने की तैयारी कर रहा है। संगठन की मांग है कि अध्यापन से जुड़ा कोई भी नया निर्णय लागू करने से पहले स्कूलों में कर्मचारियों की कमी, शिक्षकों की उपलब्धता और प्राचार्यों के प्रशासनिक अधिकारों जैसी समस्याओं का समाधान किया जाए।
स्कूल शिक्षा विभाग का आदेश तत्काल प्रभाव से लागू किया गया है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि प्रदेश के स्कूलों में प्राचार्यों के लिए रोजाना दो पीरियड अध्यापन की व्यवस्था किस तरह लागू होती है। एक ओर विभाग इसे स्कूलों की शैक्षणिक व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में कदम मान रहा है, वहीं दूसरी ओर प्राचार्य एसोसिएशन इसे मौजूदा समस्याओं के बीच अतिरिक्त जिम्मेदारी के रूप में देख रहा है। अब निगाहें सरकार और प्राचार्य संगठन के बीच होने वाली बातचीत पर रहेंगी।
Updated on:
12 Sept 2026 03:46 pm
Published on:
12 Sept 2026 03:46 pm
