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Rajgarh News : 1857 से 33 साल पहले यहां जाग चुकी थी आज़ादी की अलख, गोवा मुक्ति में भी छलकाया रक्त

Rajgarh News : आजादी की अनकही कहानी... 1824 में कुंवर चैन सिंह ने अंग्रेजी सत्ता को ललकारा था। 1955 में गोवा मुक्ति आंदोलन में तीन क्रांतिकारी हुए थे शहीद।
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राजगढ़

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Mohammad Faiz Mubarak

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Lakshmi Narayan Yadav

Aug 15, 2026

Rajgarh News

Rajgarh News (1857 से 33 साल पहले यहां जाग चुकी थी आज़ादी की अलख Photo Source- Input)

15 August 2026 : आज जब देश आजादी का पर्व मना रहा है, तब मौजूदा मध्य प्रदेश राज्य में स्थित राजगढ़ की मिट्टी को सिर्फ 15 अगस्त 1947 की तारीख से याद करना अधूरा होगा। इस धरती पर अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध की आवाज 1857 की क्रांति से भी 33 साल पहले उठ चुकी थी। नरसिंहगढ़ के कुंवर चैन सिंह ने 1824 में अंग्रेजों के सामने झुकने से इंकार कर दिया था। यही नहीं, गुलामी की जंजीरों में बंधकर रहने के बजाए आजादी के लिए संघर्ष करते हुए शहीद हुए थे। आजादी के बाद भी यह सिलसिला नहीं थमा।

देश को आजादी मिलने के 7 साल बाद वर्ष 1955 में चले गोवा मुक्ति आंदोलन में भी राजगढ़ अंचल के तीन क्रांतिकारियों ने देश के लिए प्राण न्योछावर किए। यानी यहां आजादी की कहानी 1947 पर खत्म नहीं होती, बल्कि संघर्ष और बलिदान के कई अध्यायों में आगे बढ़ती है।

1857 से 33 साल पहले उठी थी आवाज

वर्ष 1824, देश में अंग्रेजी सत्ता का दबदबा बढ़ रहा था। अधिकांश रियासतें अंग्रेजी हुकूमत के सामने समझौते का रास्ता अपना रही थीं। इसी दौर में वर्तमान राजगढ़ जिले के हिस्से रही नरसिंहगढ़ रियासत के कुंवर चैन सिंह ने अंग्रेजों का विरोध किया। उन्होंने सत्ता के सामने झुकने के बजाय संघर्ष का रास्ता चुना। अंग्रेजों से लड़ते हुए वे शहीद हो गए। कुंवर चैन सिंह का ये संघर्ष बताता है कि, मध्य भारत में अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध की भावना 1857 की क्रांति से काफी पहले जन्म ले चुकी थी। नरसिंहगढ़ में उनकी शहादत आज भी स्थानीय इतिहास और गौरव का महत्वपूर्ण अध्याय है।

1947 में राजगढ़ जिला था ही नहीं

देश जब 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ, तब आज के स्वरूप वाला राजगढ़ जिला अस्तित्व में नहीं था। ये पूरा अंचल अलग - अलग रियासतों और प्रशासनिक इकाइयों में बंटा हुआ था। नरसिंहगढ़, राजगढ़, खिलचीपुर, देवास समेत कई रियासतों का अपना - अपना प्रशासन था। आजादी के बाद रियासतों के एकीकरण और प्रशासनिक पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू हुई। इसी क्रम में मई 1948 में राजगढ़ की प्रशासनिक पहचान आकार लेने लगी। यानी जिस राजगढ़ को आज हम एक जिले के रूप में जानते हैं, उसका प्रशासनिक स्वरूप देश की आजादी के बाद विकसित हुआ।

आजादी के बाद भी जारी रहा बलिदान

राजगढ़ अंचल की देशभक्ति की कहानी 1947 पर खत्म नहीं हुई। वर्ष 1955 में गोवा मुक्ति आंदोलन में जिले के तीन क्रांतिकारी शहीद हुए। ब्यावरा के श्याम भरथरे, पिपल्याकुल्मी के बाबूलाल सौंधिया और माचलपुर के कल्याण शर्मा ने पुर्तगाली शासन से गोवा को मुक्त कराने के आंदोलन में प्राण न्योछावर किए। सुठालिया के शिवदयाल मिश्र और ब्यावरा के रामकरण उग्र भी इस आंदोलन में गंभीर रूप से घायल हुए। इसलिए राजगढ़ की आजादी की कहानी सिर्फ एक तारीख नहीं है। यह 1824 के प्रतिरोध से शुरू होकर 1947 की स्वतंत्रता और उसके बाद भी देश के लिए दिए गए बलिदानों तक फैली हुई है। स्वतंत्रता दिवस पर इस इतिहास को याद करना उस मिट्टी और उन लोगों को नमन करना है, जिन्होंने अलग-अलग दौर में देश के लिए अपना सब कुछ दिया।

इतिहास की टाइमलाइन

-1824: नरसिंहगढ़ के कुंवर चैन सिंह का अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष।
-1947: भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन वर्तमान राजगढ़ जिला अस्तित्व में नहीं था।
-1948: आदाज भारत के तहतजिले का गठन किया गया।
-1955: गोवा मुक्ति आंदोलन में जिले पांच क्रांतिकारी शामिल हुए