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3 साल का धरम ढाई महीने से वेंटिलेटर में.. अब डॉक्टर ने कहा- मौत से जीत लिया जंग

Micro Phase Syndrome case in CG: डॉक्टरों ने चार माह तक ऑब्जर्वेशन में रखकर बच्चे का इलाज किया। बालक ढाई माह तक वेंटिलेटर में रहा। इसके बाद सुधार होने पर एक माह ऑक्सीजन देने की नौबत आई। बच्चा बहुत ज्यादा गंभीर था

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बालोद जिला निवासी तीन वर्षीय धरम नामक बालक माइक्रो फेज सिंड्रोम जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित था। बार-बार झटके आ रहे थे। परिजनों ने बालक को पेंड्री स्थिति मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में भर्ती कराया । यहां डॉक्टरों ने चार माह तक ऑब्जर्वेशन में रखकर बच्चे का इलाज किया। बालक ढाई माह तक वेंटिलेटर में रहा। इसके बाद सुधार होने पर एक माह ऑक्सीजन देने की नौबत आई। बच्चा बहुत ज्यादा गंभीर था।

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उसके परिजन घर ले जाने की बात कहते थे पर बच्चे की माँ ने कभी हिम्मत नहीं हारी और लगातार इलाज पर ध्यान देती रही। चार माह तक उपचार के बाद बालक को 21 दिसंबर को डिस्चार्ज कर दिया गया। बच्चे के ठीक होने पर परिजनों की आंखों में खुशी के आंसू छलक पड़े। परिजनों ने डॉक्टरों की टीम को धन्यवाद कहा। बच्चे को परिजनों ने 10 अगस्त को मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में भर्ती कराया था तब बच्चे की हालत बहुत नाजुक थी।

भर्ती के समय बच्चे को साँस लेने में तकलीफ थी और शरीर में रक्त का बहाव भी कम हो गया था। विभाग के डॉक्टरों ने इलाज शुरू किया। इस दौरान 15 दिन बाद बच्चे को वेंटिलेटर लगाया गया। बच्चे को ढाई महीने तक वेंटिलेटर पर रखा गया। इस बीच बच्चे के गले में छेद कर के पाइप के लिए नली भी डाली गई।

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इस बीच बच्चे को लगातार झटके आ रहे थे। मेडिकल कॉलेज के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ धनंजय ठाकुर ने बताया कि बच्चे को मैक्रो फेज एक्टिवेट सिंड्रोम के कराना दिमाग में हेमरज हो गया था। बच्चे को जब लाया गया तब बच्चा बेहोश था। शरीर में खून का बहाव कम था। झटके आ रहे थे।

डॉ. धनंजय ने बताया कि ऐसी बीमारी में वेंटिलेटर की आवश्यकता लंबे समय तक होती है। एंटीबायोटिक और जीवन रक्षक दवाइयाें का सही डोज सतर्कता के साथ बच्चे को लगाया जाता है। टीम वर्क की वजह से बच्चे की जान बचा पाए।

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हड़ताल की चुनौती को भी झेला
डॉक्टरों ने बताया कि माह के भीतर कई ऐसे दौर आए जब बच्चे की देखरेख को लेकर चुनौती थी। जूनियर डॉक्टरों ने हड़ताल की। नर्सेस भी हड़ताल में गई थीं। ऐसे में दूसरे स्टाफ ने बच्चे पर नजर रखी। डॉक्टरों ने भी लगातार निगरानी में रखकर उपचार किया।

इलाज पर भरोसा रखा
घर वाले हिम्मत हार गए थे लेकिन डॉक्टरों और नर्स की टीम ने हिम्मत नहीं हारी। वेंटिलेटर में बच्चा ठीक होने लगा फिर उसे ऑक्सीजन में शिफ्ट किया गया। ऑक्सीजन में बच्चा एक महीने तक रहा। इलाज के दौरान बच्चे को 10 बार ब्लड भी लगाया गया। डॉक्टरों के सटीक इलाज और नर्सेस की मेहनत से बच्चा धीरे-धीरे ठीक होने लगा। इस बीच बच्चे के घर वालों ने कई बार हिम्मत हार के घर ले जाने की बात की लेकिन बच्चे की माँ ने आखिर तक हिम्मत नहीं हारी। इलाज पर भरोसा रखा।