
कक्षा में पढ़ाते शिक्षक संजय गौड़
रतलाम. ’शिक्षक’ सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि भावी पीढ़ी को गढऩे का एक पावन संकल्प है। इस पंक्ति को अपने रक्त और पसीने से चरितार्थ किया है शासकीय हाई स्कूल थंब गुराडिय़ा के समर्पित शिक्षक संजय गौड़ ने। जब अपनी ही सांसों पर संकट मंडरा रहा हो और शरीर का हर अंग असहनीय पीड़ा से चिल्ला रहा हो, तब भी किसी और के बच्चों के भविष्य की ङ्क्षचता में खुद को मिटा देना...यह समर्पण केवल एक सच्चे गुरु ही दिखा सकते हैं।
हादसे के तीन दिन बाद ही थाम ली चौक-डस्टर
बात सत्र 2018-19 की है, जब डाइट से प्रशिक्षण लेकर लौटते समय संजय गौड़ भीषण दुर्घटना का शिकार हो गए। कंधे की हड्डी पूरी तरह टूट गई और डॉक्टरों को ऑपरेशन कर लोहे की प्लेट (इम्प्लांट) डालनी पड़ी। डॉक्टरों ने बेड रेस्ट की सख्त सलाह दी, लेकिन शिक्षक के मन में तो केवल बोर्ड परीक्षा और अपने विद्यार्थियों के भविष्य का ख्याल उमड़ रहा था। ऑपरेशन के महज तीन दिन बाद, कंधे पर पट्टा बांधकर वे नागदा से अप-डाउन करते हुए स्कूल पहुंच गए।
घाव में पड़ा पस, फिर भी टालते रहे इलाज
नियमित स्कूल आने-जाने के धक्कों से ऑपरेशन का घाव बिगड़ गया। कंधे में लगी रॉड बाहर निकल आई, खून बहने लगा और घाव में इन्फेक्शन फैलने लगा। डॉक्टरों ने चेतावनी दी कि अगर तुरंत दूसरा ऑपरेशन नहीं कराया और दवाइयों में चूक हुई तो जहर पूरे शरीर में फैल जाएगा, जिससे जान भी जा सकती है। इस दौरान बच्चों की वार्षिक परीक्षाएं सिर पर थीं। उन्होंने अपनी ङ्क्षजदगी की परवाह किए बिना अपना ही ऑपरेशन टाल दिया। इसके बाद कोरोना काल में विशेष अनुमति लेकर 6 महीने बाद उनका दूसरा ऑपरेशन हो सका।
जान जाने का भी कोई मलाल नहीं’
जब डॉक्टरों ने उनकी इस जानलेवा लापरवाही पर डांट लगाई, तो इस निष्ठावान शिक्षक का जवाब था-साहब, मेरे बच्चों का रिजल्ट 75 प्रतिशत आया, वो सब पास हो गए...इसके आगे मेरी जान की कोई कीमत नहीं। आज भी संजय उसी अटूट निष्ठा और जज्बे के साथ बच्चों को गणित के सूत्र सिखा रहे हैं। उनका यह अनूठा त्याग पूरे शिक्षा जगत के लिए एक नई मिसाल बन गया है।
Updated on:
05 Sept 2026 08:10 pm
Published on:
05 Sept 2026 08:10 pm
