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कुछ रोग केवल मन की कल्पना से जन्म लेते हैं : आचार्य श्रीराम शर्मा

स्वस्थ शरीर वाले व्यक्ति से स्वस्थ समाज की रचना होती है
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भोपाल

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Shyam Kishor

Mar 18, 2020

कुछ रोग केवल मनुष्य के मन की कल्पना से जन्म लेते हैं : आचार्य श्रीराम शर्मा

कुछ रोग केवल मनुष्य के मन की कल्पना से जन्म लेते हैं : आचार्य श्रीराम शर्मा

मानसिक रोगों का एक कारण को मनोविज्ञानी लोग आत्म केन्द्रित होना बताते हैं। व्यक्ति जितना आत्म केन्द्रित होगा उतनी ही मानस रोग एवं शारीरिक रोग की संभावना उसमें बढ़ जाएगी। संभवत: इस तथ्य से हमारे प्राचीन ऋषि परिचित रहे होंगे। इसलिए "आत्मवत सर्वभूतेषु" और "वसुधैव कुटुम्बकम्" जैसे सिद्धान्त-वाक्यों के पीछे उनका एक भाव व्यक्ति और सामाज को आत्म केन्द्रित होने से बचाना भी होगा, ताकि स्वरुप मन और स्वस्थ शरीर वाले व्यक्ति और समाज की रचना की जा सके।

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पिछले सौ-डेढ़ सौ वर्षों से संसार में स्वार्थपरता की वृद्धि के साथ ही ईश्वर से विमुखता का भाव भी जोर पकड रहा था। अब कई बार ठोकरें खाने के बाद संसार को विशेष रुप से सबसे धनी और ऐश्वर्य शाली देशों को फिर से ईश्वर की याद आ रही है। केवल धन से ही सुख तथा शान्ति नहीं मिलती। इसके लिए चित्त की शुद्धता बिना विवेक के संभव नहीं और विवेक धर्म तथा ईश्वर के ज्ञान से ही उत्पन्न हो सकता है।

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मनुष्य चाहे समाज की दृष्टि से बचकर चुपचाप कोई पाप कर डाले, जंगल में छिपकर किसी की हत्या कर डाले, रात के घनघोर अन्धकार में पाप कर ले, लेकिन सर्वव्यापक परमात्मा की दिनरात, भीतर बाहर सब ओर देखने वाली असंख्य दृष्टियों से नहीं बच सकता। घर, बाहर, जंगल, समुद्र, आकाश, व्यवहार, व्यापार सर्वत्र ईश्वर ही ईश्वर है। आप की अलग कोई सत्ता नहीं है। आप स्वयं ही अपने अन्दर परमात्मा को बसाये हुए है।

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जिस प्रकार शरीर के रोग है उसी प्रकार मन के रोग भी है और वे मनुष्य की कल्पना से ही जन्म लेते हैं। जब मन में क्रोध होता है तो किसी से बदला लेने की इच्छा होती है। ईर्ष्या होती है तो मन अशान्त हो जाता है और मन दु:खी रहता है। अनेक लोग दुसरों को झूठ-मूंठ शत्रु अथवा प्रतियोगी समझकर दुख पाते हैं। जिस मनुष्य ने अपने जीवन में अनेक अत्याचार किये हैं वह भी मरने के समय उनकी स्मृति से अत्यन्त दु:ख को प्राप्त होता है। चुगलखोर के मन में एक प्रकार की खुजलाहट बनी रहती है जो उसके मन को सदैव अशान्त रखती है।

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