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अघोरियों का संसार: जानिये इसके रहस्य के साथ ही अघोरपंथ की उत्पत्ति और इतिहास

11 मार्च से 27 अप्रैल तक ही कुम्भ मेला...

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HARIDWAR KUMBH 2021: know all the things about Aghori world

HARIDWAR KUMBH 2021: know all the things about Aghori world

हरिद्वार में इस साल 2021 में शुरु होने वाले कुंभ मेले के पास आने के साथ ही साधु-संतों भी डेरा जमाना शुरु कर देंगे। इस विशाल महा-आयोजन में सबसे ज्यादा अगर कोई आकर्षण का विषय होगा, तो वह होंगे अघोरी। ये वहीं हैं जो कापालिक क्रिया करते हैं, साथ ही जो तांत्रिक साधना श्मशान में करते हैं और वह जो भस्म से लिपटे होते हैं, जिनसे आमजन स्वाभाविक तौर पर डरते हैं।

दरअसल हरिद्वार में इस साल होने जा रहा कुंभ का आयोजन साढ़े तीन महीने के बजाय केवल 48 दिन का ही होगा, कोरोना की वजह से 11 मार्च से 27 अप्रैल तक ही कुम्भ मेला चलेगा।

कुंभ मेले में कुल चार शाही स्नान होंगे। पहला शाही स्नान 11 मार्च को महाशिवरात्रि के मौके पर होगा तो दूसरा शाही स्नान 12 अप्रैल को सोमवती अमावस्या पर, तीसरा शाही स्नान 14 अप्रैल को संक्राति के अवसर पर और चौथा शाही स्नान 27 अप्रैल को चैत्र पूर्णिमा के दिन होगा। कोरोना की वजह से साढ़े तीन महीने तक चलने वाला कुम्भ इस साल मात्र डेढ़ महीने का होगा।

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ऐसे में आज हम आपको अघोरियों के संसार से जुड़ी कुछ खास बातों के बारे में बता रहे हैं। दरअसल अघोरियों का संसार काफी रहस्यमयी माना जाता है। मनुष्य योनी में जीवन प्राप्ति के बाद भी ये 'अघोरी साधु' एक अज्ञात जिंदगी के अनुसरणकर्ता कहलाए जाते हैं। इनका उठना-बैठना, खान-पान यहां तक कि विचार आम इंसान से काफी अलग होते हैं।

अघोरियों के बारे में मान्यता है कि बड़े ही रूखे स्वभाव के होते हैं लेकिन भीतर उनमें जन कल्याण की भावना छुपी होती है। अगर किसी पर मेहरबान हो जाए तो अपनी सिद्धि का शुभ फल देने में भी नहीं हिचकते और अपनी तांत्रिक क्रियाओं का रहस्य भी उजागर कर देते हैं। यहां तक कि कोई उन्हें अच्छा लग जाए तो उसे वह अपनी तंत्र क्रिया सीखाने को भी राजी हो जाते हैं लेकिन इनका क्रोध प्रचंड होता है।

पौराणिक काल से ही इस खास हिन्दू संप्रदाय का अंकुरण बताया जाता है। इन्हें हिन्दू धर्म के अंतर्गत अघोर पंथ का माना गया है। जिनका संबंध भगवान शिव से ज्यादा रहा है।

जानकारों की भी मानें तो अघोरी हमेशा से ही खास चर्चा का विषय रहे हैं। ऐसे में इस बार हम आपको अघोरियों की रहस्यमयी दुनिया और अघोरपंथ के बारे में बता रहे हैं...

दरअसल अघोर पंथ, अघोर मत या अघोरियों का संप्रदाय, हिंदू धर्म का एक संप्रदाय है। इसका पालन करने वाले 'अघोरी' कहलाते हैं। मान्यता के अनुसार इसके प्रवर्त्तक स्वयं अघोरनाथ शिव हैं, रुद्र की मूर्ति को श्वेताश्वतरोपनिषद (3-5) में अघोरा वा मंगलमयी कहा गया है।

या ते रुद्र शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी।
तया नस्तनुवा शंतमया गिरिशन्ताभिचाकशीहि॥

अर्थात-"हे गिरिशन्त अर्थात् पर्वत पर स्थित होकर सुख का विस्तार करने वाले रुद्र। आप हमें अपनी उस मङ्गलमयी मूर्ति द्वारा अवलोकन करें, जो सौम्य होने के कारण केवल पुण्यों का फल प्रदान करने वाली है।"

इस पंथ के प्रणेता भगवान शिव माने जाते हैं। कहा जाता है कि भगवान शिव ने स्वयं अघोर पंथ को प्रतिपादित किया था। अवधूत भगवान दत्तात्रेय को भी अघोरशास्त्र का गुरु माना जाता है। अवधूत दत्तात्रेय को भगवान शिव का अवतार भी मानते हैं। अघोर संप्रदाय के विश्वासों के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और शिव इन तीनों के अंश और स्थूल रूप में दत्तात्रेय जी ने अवतार लिया।

साधना की एक रहस्यमयी शाखा है अघोरपंथ। उनका अपना विधान है, अपनी विधि है, अपना अलग अंदाज है जीवन को जीने का। अघोरपंथी साधक अघोरी कहलाते हैं। खाने-पीने में किसी तरह का कोई परहेज नहीं होता। अघोरी लोग गाय का मांस छोड़ कर बाकी सभी चीजों का भक्षण करते हैं। अघोरपंथ में श्मशान साधना का विशेष महत्व है, इसीलिए अघोरी शमशान वास करना ही पंसद करते हैं। श्मशान में साधना करना शीघ्र ही फलदायक होता है।

इस संप्रदाय के एक संत के रूप में बाबा किनाराम की पूजा होती है। शिव जी के अनुयायी अघोर संप्रदाय के अनुसार शिव स्वयं में संपूर्ण हैं और जड़, चेतन समस्त रूपों में विद्यमान हैं। इस शरीर और मन को साध कर और जड़-चेतन और सभी स्थितियों का अनुभव कर के और इन्हें जान कर मोक्ष की प्राप्ति की जा सकती है।

इसके अलावा विदेशों में, विशेषकर ईरान में, भी ऐसे पुराने मतों का पता चलता है और पश्चिम के कुछ विद्वानों ने उनकी चर्चा भी की है।

हेनरी बालफोर की खोजों से विदित हुआ है कि इस पंथ के अनुयायी अपने मत को गुरु गोरखनाथ द्वारा प्रवर्तित मानते हैं, किंतु इसके प्रमुख प्रचारक मोतीनाथ हुए जिनके विषय में अभी तक अधिक पता नहीं चल सका है।

अघोर साधनाएं मुख्यतः शमशान घाटों और निर्जन स्थानों पर की जाती है। शव साधना एक विशेष क्रिया है जिसके द्वारा स्वयं के अस्तित्व के विभिन्न चरणों की प्रतीकात्मक रूप में अनुभव किया जाता है। अघोर विश्वास के अनुसार अघोर शब्द मूलतः दो शब्दों 'अ' और 'घोर' से मिल कर बना है जिसका अर्थ है जो कि घोर न हो अर्थात सहज और सरल हो।

प्रत्येक मानव जन्मजात रूप से अघोर अर्थात सहज होता है। बालक ज्यों ज्यों बड़ा होता है त्यों वह अंतर करना सीख जाता है और बाद में उसके अंदर विभिन्न बुराइयां और असहजताएं घर कर लेती हैं और वह अपने मूल प्रकृति यानी अघोर रूप में नहीं रह जाता।

अघोर साधना के द्वारा पुनः अपने सहज और मूल रूप में आ सकते हैं और इस मूल रूप का ज्ञान होने पर ही मोक्ष की प्राप्ति संभव है।

इस संप्रदाय के साधक समदृष्टि के लिए नर मुंडों की माला पहनते हैं और नर मुंडों को पात्र के तौर पर प्रयोग भी करते हैं। चिता के भस्म का शरीर पर लेपन और चिताग्नि पर भोजन पकाना इत्यादि सामान्य कार्य हैं। अघोर दृष्टि में स्थान भेद भी नहीं होता अर्थात महल या श्मशान घाट एक समान होते हैं।

अघोर पंथ की प्रमुख शाखाएं तीन हैं-
1. औघर
2. सरभंगी
3. घुरे

औघर शाखा में कल्लूसिंह थे, जो बाबा किनाराम के गुरु थे। कुछ लोग इस पंथ को गुरु गोरखनाथ के भी पहले से प्रचलित बतलाते हैं और इसका संबंध शैव मत के पाशुपत अथवा कालामुख संप्रदाय के साथ जोड़ते हैं। वहीं कुछ का मानना है चुकिं बाबा गौरखनाथ को हर युग में देखा गया है, अत: इस संप्रदाय का भी उनसे जुड़ाव है।

बनारस जिले के रामगढ़ गांव में उत्पन्न हुए बाबा किनाराम अघोरी थे और बाल्यकाल से ही विरक्त भाव में रहते थे। इन्होंने पहले बाबा शिवाराम वैष्णव से दीक्षा ली थी, किंतु वे फिर गिरनार के किसी महात्मा द्वारा भी प्रभावित हो गए। ऐसी मान्यता है कि वो महात्मा कोई और नहीं गुरु दत्तात्रेय ही हैं, जिनकी ओर इन्होंने स्वयं भी कुछ संकेत किए हैं।

बाबा किनाराम ने इस पंथ के प्रचारार्थ रामगढ़, देवल, हरिहरपुर तथा कृमिकुंड पर क्रमश चार मठों की स्थापना की जिनमें से कृमिकुंड चौथा प्रधान केंद्र ह।. इस पंथ को साधारणतः 'औघढ़पंथ' भी कहते हैं।

अघोर पन्थ की 'घुरे' नाम की शाखा के प्रचार क्षेत्र का पता नहीं चलता किंतु 'सरभंगी' शाखा का अस्तित्व विशेषकर चंपारन जिले में दीखता है जहां पर भिनकराम, टेकमनराम, भीखनराम, सदानंद बाबा एवं बालखंड बाबा जैसे अनेक आचार्य हो चुके हैं। इनमें से कई की रचनाएं प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं और उनसे इस शाखा की विचारधारा पर भी बहुत प्रकाश पड़ता है।

'विवेकसार' इस पंथ का एक प्रमुख ग्रंथ है जिसमें बाबा किनाराम ने आत्माराम की वंदना और अपने आत्मानुभव की चर्चा की है। उसके अनुसार सत्य वा निरंजन है जो सर्वत्र व्यापक और व्याप्य रूपों में वर्तमान है और जिसका अस्तित्व सहज रूप है।

ग्रंथ में उन अंगों का भी वर्णन है जिनमें से प्रथम तीन में सृष्टिरहस्य, कायापरिचय, पिंडब्रह्मांड, अनाहतनाद एवं निरंजन का विवरण है। अगले तीन में योग साधना, निरालंब की स्थिति, आत्मविचार, सहज समाधि आदि की चर्चा की गई है और शेष दो में संपूर्ण विश्व के ही आत्मस्वरूप होने और आत्मस्थिति के लिए दया, विवेक आदि के अनुसार चलने के विषय में कहा गया है।

खास बात ये भी है कि इसके अनुयायियों में सभी जाति के लोग, (यहां तक कि मुसलमान भी), हैं। विलियम क्रुक ने अघोरपंथ के सर्वप्रथम प्रचलित होने का स्थान राजपुताने के आबू पर्वत को बतलाया है, किंतु इसके प्रचार का पता नेपाल, गुजरात और समरकंद जैसे दूर स्थानों तक भी चलता है और इसके अनुयायियों की संख्या भी कम नहीं है।

अघोरी श्‍मशान घाट में तीन तरह से साधना करते हैं - श्‍मशान साधना, शिव साधना, शव साधना। ऐसी साधनाएं अक्सर तारापीठ के श्‍मशान, कामाख्या पीठ के श्‍मशान, त्र्यम्‍बकेश्वर और उज्जैन के चक्रतीर्थ के श्‍मशान में होती है। अघोर पंथियों के 10 तांत्रिक पीठ माने गए हैं।

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