
Ambubachi Mela 2026: जानिए कामाख्या का वह आदिम सच, जहां सदियों से पूजनीय है माहवारी (फोटो सोर्स : AI@chatgpt)
Ambubachi Mela 2026: हमारे समाज का यह दोहरा रवैया वाकई हैरान करने वाला है। एक तरफ जहां आज भी देश के कई हिस्सों में माहवारी (Menstruation) के दौरान लड़कियों को रसोई से दूर कर दिया जाता है, उन्हें अपवित्र मानकर मंदिरों में प्रवेश नहीं दिया जाता, वहीं दूसरी तरफ इसी देश के एक कोने में इस प्राकृतिक प्रक्रिया को ब्रह्मांड की सबसे बड़ी रचनात्मक शक्ति के रूप में पूजा जाता है। असम की राजधानी गुवाहाटी में नीलांचल पर्वत पर स्थित मां कामाख्या देवी का मंदिर इसी अनूठे सच का गवाह है। लेकिन आज के इंस्टाग्राम और यूट्यूब के दौर में इस बेहद पवित्र और दार्शनिक स्थल को महज काले जादू का केंद्र बताकर इसके वास्तविक गौरव को धुंधला कर दिया गया है।
हर साल जून के महीने में (आमतौर पर 22 से 26 जून के बीच) कामाख्या मंदिर के कपाट तीन दिनों के लिए पूरी तरह बंद कर दिए जाते हैं। मान्यता है कि इस दौरान मां कामाख्या रजस्वला (Kamakhya Temple Menstruation Festival) होती हैं। चौथे दिन जब मंदिर के द्वार खुलते हैं, तो पूरा नीलांचल पर्वत जय मां कामाख्या के जयकारों से गूंज उठता है। इस महापर्व को अंबुबाची मेला कहा जाता है, जिसे पूर्वोत्तर का कुंभ भी माना जाता है।
कपाट बंद होने से ठीक पहले मंदिर के गर्भगृह में एक सफेद सूती कपड़ा बिछाया जाता है। चौथे दिन जब द्वार खुलते हैं, तो वह वस्त्र पूरी तरह लाल हो चुका होता है। इसे रक्त वस्त्र या अंगोदक कहा जाता है, जिसे पाने के लिए दुनिया भर से श्रद्धालु और तंत्र साधक साल भर इंतजार करते हैं।
A repository of academic papers and research articles on Kamakhya छपे एक शोध पत्र के मुताबिक, कामाख्या का इतिहास मुख्यधारा के सनातन धर्म से भी पुराना है। यह मंदिर मूल रूप से असम की प्राचीन जनजातियों (खासी, गारो और बोडो) की प्रकृति और उर्वरता (Fertility) पूजा से जुड़ा हुआ था।
खासी भाषा में एक शब्द है 'का-मेई-खा', जिसका अर्थ होता है वह मां जो जन्म देती है। समय के साथ यही परंपरा शाक्त और तंत्र मतों में विलीन हो गई। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से माता सती के शव के टुकड़े किए थे, तब यहां उनका योनि भाग गिरा था। यही कारण है कि यहां मां की कोई मूर्ति नहीं है, बल्कि गर्भगृह में एक प्राकृतिक चट्टान है जिससे लगातार जलधारा प्रवाहित होती रहती है।
कामाख्या को सिर्फ किताबों से नहीं, बल्कि वहां की हवाओं में तैरती कहानियों से समझा जा सकता है। यहां के स्थानीय लोग आज भी दो प्राचीन किस्से बड़े चाव से सुनाते हैं:
स्थानीय लोककथाओं में यह कहानी प्रचलित है कि, कामाख्या के एक परम भक्त पुजारी केंडुक कलाई से माता साक्षात बात करती थीं। एक बार एक रोती हुई मां अपनी मृत बच्ची को लेकर मंदिर पहुंची। पुजारी की निश्छल प्रार्थना पर मां कामाख्या ने उस मासूम को दोबारा जीवन दान दे दिया था।
कालिका और भागवत पुराण में जिक्र है कि असुर राजा नरकासुर देवी से विवाह करना चाहता था। देवी ने शर्त रखी कि अगर वह एक ही रात में नीलांचल पर्वत के नीचे से मंदिर तक पत्थरों की सीढ़ियां बना देगा, तो वह मान जाएंगी। नरकासुर काम पूरा करने ही वाला था कि देवी की माया से एक मुर्गे ने सुबह होने से पहले ही बांग दे दी। नरकासुर शर्त हार गया और बाद में भगवान कृष्ण के हाथों मारा गया।
51 शक्तिपीठों का महाकेंद्र: कामाख्या को सभी 51 शक्तिपीठों में सबसे शक्तिशाली (महापीठ) माना जाता है क्योंकि इसे सृष्टि की उत्पत्ति का केंद्र बिंदु कहा गया है।
10 महाविद्याओं का वास: कामाख्या मंदिर परिसर के भीतर ही तंत्र साधना की सर्वोच्च देवियों दस महाविद्याओं (जैसे तारा, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगालामुखी, मातंगी और कमला) के अलग-अलग मंदिर स्थित हैं।
शारीरिक शुद्धता का संदेश: कामाख्या जाने वाले श्रद्धालुओं को गर्भगृह के भीतर जल को अपने ऊपर छिड़कने की सलाह दी जाती है। यहाँ शरीर या उसके प्राकृतिक चक्रों को 'अशुद्ध' नहीं, बल्कि 'दिव्य' माना जाता है।
कामाख्या हमें एक बड़ा सबक सिखाती है। अगर जीवन देने वाली शक्ति पवित्र है, तो उस जीवन को मुमकिन बनाने वाली प्राकृतिक प्रक्रिया अपवित्र कैसे हो सकती है? अगली बार जब आप असम जाएं, तो सोशल मीडिया के डर और अंधविश्वास को छोड़कर, इस प्रकृति और स्त्रीत्व के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण के प्रतीक को महसूस करने नीलांचल पर्वत जरूर चढ़ें।
अस्वीकरण (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी केवल सामान्य सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। यहाँ दी गई ज्योतिष, वास्तु या धार्मिक जानकारी मान्यताओं और विभिन्न स्रोतों पर आधारित है। हम इसकी पूर्ण सटीकता या सफलता की गारंटी नहीं देते हैं। किसी भी उपाय, सलाह या विधि को अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के प्रमाणित विशेषज्ञ या विद्वान से परामर्श अवश्य लें।
Published on:
23 Jun 2026 11:28 am
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