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शुद्ध प्रेम क्या है, उर्मिला से मिलती है सीख

आज के जमाने में बात तो खूब प्यार की होती है, लेकिन प्रतिकूल परिस्थिति आते ही आज के प्यार के ताने बाने उधड़ जाते हैं, क्योंकि आज अक्सर लोग जिसे प्यार कह देते हैं उसमें शुद्धता, विश्वास की कमी और किन्हीं जरूरतों का लेनदेन देखा जाता है। लेकिन शुद्ध प्रेम क्या है, रामायण इसकी सीख देती है। रामायण में प्रेम की पराकाष्ठा (ऊंचाई) क्या हो सकती है, इसे परंपरा सीरिज के 29 वें एपिसोड में बता रहे हैं गोपालगंज (बिहार) के पं. सर्वेश तिवारी श्रीमुख..
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Pravin Pandey

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Updated: 12 Jun 2023, 3:35 PM IST

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शुद्ध प्रेम क्या है, इस पर रामायण क्या कहती है

रामायण और राम चरित मानस के प्रसंग के आधार पर पं. सर्वेश तिवारी कहते हैं कि वियोग प्रेम के लिए संजीवनी समान होता है। साथ के दिन सहज होते हैं, उल्लास से भरे हुए होते हैं। प्रेम होता है, प्रेम से भरी बातें होती हैं, परिहास भी होता है और सहज मनमुटाव भी होते हैं। दुख आए तो बांट लेने के लिए सबसे विश्वसनीय साथी पास होता है और सबसे महत्वपूर्ण वस्तु होती है प्रिय को सामने देखते रहने की निश्चिन्तता।


वियोग के दिनों में न प्रेम भरी बातें होती हैं, न परिहास, न विवाद... न आंखों के आगे साथी होता है, न दुखों में लिपट कर रो उठने के लिए उसका शरीर... तब जो कुछ बचता है वह शुद्ध प्रेम होता है। यह सहज मानवीय स्वभाव है कि हमारी जो वस्तु हमारे पास न हो, हमें उसी की सर्वाधिक आवश्यकता पड़ती है। प्रिय यदि साथ हो तो कई-कई दिन उससे बात करने का भी मन नहीं होता, पर वही जब दूर चला जाय तो मन बार बार उसी की ओर खिंचा चला जाता है। वह पास होता है तो हृदय के एक हिस्से पर उसका अधिकार होता है, पर दूर जाते ही वह हृदय पर छा जाता है। हृदय में उसके अतिरिक्त किसी अन्य के लिए कोई स्थान नहीं बचता।

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उर्मिला की भी वही दशा थी। राजा दशरथ जैसे स्नेह देने वाले ससुर, सुमित्रा जैसी भोली सास, और लक्ष्मण सा तेजस्वी पति पाने के बाद उस बालिका ने कभी न सोचा था कि जीवन में वियोग के इतने कठिन दिन भी आएंगे, पर जीवन व्यक्ति की इच्छानुसार ही चले, यह कहां होता है?


मिथिला की वह पवित्र भूमि जिसने संसार को प्रेम, त्याग और धर्म की शिक्षा दी, उसी पवित्र माटी की पुत्री उर्मिला को लगा जैसे उसे इन तीनों विषयों की परीक्षा देनी है। उसने स्वयं को इस परीक्षा के लिए सज्ज कर लिया था।


स्त्रियां अपने दुख के दिन रोकर काट लेती हैं। रोना उनके भारी मन को हल्का कर देता है। उर्मिला का दुर्भाग्य यह था कि अश्रुओं के महासागर में डूब चुके अयोध्या राजमहल में उसे स्वयं के अश्रुओं को रोक लेना था। उन्होंने अपने लिए तय किया था कि वे अपनी पीड़ा व्यक्त नहीं करेंगी।


उर्मिला के पति अब अज्ञात वन में थे। किसी ऐसे स्थान पर, जहां से किसी संदेश के आने की आशा नहीं थी। विपत्तियों से भरे गहन वन का जीवन और चौदह वर्ष के पहाड़ से दिन, इन दिनों में उर्मिला के पास लक्ष्मण से जुड़ा कुछ था तो उनकी चिन्ता थी।


लक्ष्मण और उर्मिला की दशा में एक समानता थी। लक्ष्मण उनके साथ थे जिनकी सेवा का उन्होंने व्रत लिया था, और उर्मिला उनके साथ थीं जिनकी सेवा का उन्होंने व्रत लिया था, पर उन दोनों की दशा में एक असमानता भी थी। लक्ष्मण अपने भइया-भाभी की सेवा करके ही पूर्ण प्रसन्न रह सकते थे, पर उर्मिला अपने परिवार की सेवा में रत रहने के बाद भी पूर्ण प्रसन्न नहीं हो सकती थीं। उर्मिला का मन लक्ष्मण की ओर लगा हुआ था।