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धर्म और ईश्वर के विषय में क्या सोचते थे महात्मा गांधी, उन्हीं के शब्दों में जानिए, खुल जाएगी बंद आंख

Mahatma Gandhi thought on religion आज के जमाने में धर्म, आस्था, भक्ति और ईश्वर की खूब चर्चा होती है, जितने मुंह उतनी बातें जैसी। लेकिन धर्म के बारे में महात्मा गांधी क्या सोचते थे, कम ही लोग जानते हैं। महात्मा गाधी की पुण्यतिथि 30 जनवरी के उपलक्ष्य में आइये जानते हैं धर्म और ईश्वर पर महात्मा गांधी के ओरिजिनल विचार..
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Pravin Pandey

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Updated: 29 Jan 2024, 9:06 PM IST

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महात्मा गांधी कुछ पढ़ते हुए

महात्मा गांधी के 16 प्रेरक वचन जो धर्म, आस्था, भक्ति और ईश्वर पर आंख खोल देंगे

1. धर्म के बिना व्यक्ति पतवार बिना नाव के समान है।
महात्मा, भाग 3 के पृष्ठ 223
2. उस आस्था का कोई मूल्य नहीं जिसे आचरण में न लाया जा सके ।
महात्मा, भाग 5 के पृष्ठ 180
3. विश्व के सारे महान धर्म मानवजाति की समानता, भाईचारे और सहिष्णुता का संदेश देते हैं।
महात्मा, भाग 3 के पृष्ठ 257


4. गीता में उल्लिखित भक्ति, कर्म और प्रेम के मार्ग में मानव द्वारा मानव के तिरस्कार के लिए कोई स्थान नहीं है।
महात्मा, भाग 2 के पृष्ठ 278
5. मैं यह अनुभव करता हूं कि गीता हमें यह सिखाती है कि हम जिसका पालन अपने दैनिक जीवन में नहीं करते हैं, उसे धर्म नहीं कहा जा सकता है।
महात्मा, भाग 2 के पृष्ठ 311
6. ईश्वर इतना निर्दयी व क्रूर नहीं है जो पुरुष-पुरुष और स्त्री-स्त्री के मध्य ऊंच-नीच का भेद करे।
महात्मा, भाग 3 के पृष्ठ 234
7. यदि आप न्याय के लिए लड़ रहे हैं, तो ईश्वर सदैव आपके साथ है।
माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, 1968, पृष्ठ 206


8. अधभूखे राष्ट्र के पास न कोई धर्म, न कोई कला और न ही कोई संगठन हो सकता है।
महात्मा, भाग 2 के पृष्ठ 251
9. हम धर्म के नाम पर गौ-रक्षा की दुहाई देते हैं किंतु बाल-विधवा के रूप में मौजूद उस मानवीय गाय की सुरक्षा से इंकार कर देते हैं।
महात्मा, भाग 2 के पृष्ठ 227
10. जब भी मैं सूर्यास्त की अद्भुत लालिमा और चंद्रमा के सौंदर्य को निहारता हूं तो मेरा हृदय सृजनकर्ता के प्रति श्रद्धा से भर उठता है।
माइंड ऑफ महात्मा गांधी, तृतीय प्रकाशन, 1968, पृष्ठ 302
11. जीवन में स्थिरता, शांति और विश्वसनीयता की स्थापना का एकमात्र साधन भक्ति है।
ट्रुथ इज गॉड, 1955 पृष्ठ 43


12. मेरे विचारानुसार गीता का उद्देश्य आत्म-ज्ञान की प्राप्ति का सर्वोत्तम मार्ग बताना है।
द मैसेज ऑफ द गीता, 1959, पृष्ठ 4
13. मनुष्य अपनी तुच्छ वाणी से केवल ईश्वर का वर्णन कर सकता है।
ट्रुथ इज गॉड, 1999 पृष्ठ 45
14. यदि आपको अपने उद्देश्य और साधन तथा ईश्वर में आस्था है तो सूर्य की तपिश भी शीतलता प्रदान करेगी।
महात्मा, भाग 2 के पृष्ठ 182


15. जो व्यक्ति अहिंसा में विश्वास करता है और ईश्वर की सत्ता में आस्था रखता है वह कभी भी पराजय स्वीकार नहीं करता।
महात्मा, भाग 5 के पृष्ठ 16
16. ब्रह्मचर्य क्या है ? यह जीवन का एक ऐसा मार्ग है जो हमें परमेश्वर की ओर अग्रसर करता है।
ट्रुथ इज गॉड, 1955 पृष्ठ 24