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सब हम कर रहे हैं या भगवान की इच्छा से हो रहा है?: ओशो

Osho on Ashtavakra Geeta in hindi: ओशो की किताब अष्टावक्र गीता महाभाग-7, समर्पित स्वतंत्रता, आध्यात्मिक पिपासुओं के लिए मीठा सागर है। इस लेख में ओशो से समझिए, सब कौन कर रहा है, भगवान या हम? परमात्मा को कैसे पाया जाए? उसका कैसे हुआ जाए?

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भारत

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Adarsh Thakur

Jan 09, 2026

Osho on Ashtavakra Geeta: ओशो अष्टावक्र गीता पर।

Osho on Ashtavakra Geeta: ओशो अष्टावक्र गीता परः सब कौन करता है? हम या परमात्मा?

Osho on Ashtavakra Geeta: ओशो ने आध्यात्मिक जिज्ञासुुओं को इतनी सरलता से हर विषय समझाया है कि आज भी उनकी बातें प्रासंगिक हैं। हर उम्र, हर वर्ग के लोग उन्हें पढ़ते-सुनते हैं। "ओशो" सीरिज के इस दूसरे लेख में हम एक जरूरी विषय लेकर आए हैं। अधिकांश लोगों के मन में एक प्रश्न हमेशा दौड़ता है कि जो कुछ भी हो रहा है, वह हम कर रहे हैं या परमात्मा की इच्छा से हो रहा है? इसका जवाब ओशो ने अपनी किताब समर्पित स्वतंत्रता (अष्टावक्र महागीता भाग-7) में बड़ी सरल भाषा में समझाया है।

प्रश्नः आप अकर्ता होने को कहते हैं, लेकिन चुनाव करते समय कर्ता फिर खड़ा हो जाता है। अकर्ता कैसे होएं? कैसे बनें उसकी बांसुरी? कैसे हटाएं 'मैं-भाव' को? कैसे पहचानें कि यह निर्णय उसका ही है?

ओशो का उत्तरः पहली बात, तुम अकर्ता न बन सकोगे। तुम्हारे कुछ किए, अकर्ता न सधेगा। तुम जो भी करोगे कर्ता ही निर्मित होगा उससे। विनम्रता भी अहंकार का ही आभूषण बन जाती है। मैं नहीं हूं, ऐसी घोषणा भी मैं से ही उठ आएगी। ऐसे तो तुम धोखे में पड़ोगे। बड़ा जाल उलझ जाएगा। ऐसे, सुलझ न सकोगे।

अकर्ता कोई नहीं बन सकता!

अकर्ता कोई नहीं बन सकता। अकर्ता बनने की बात नहीं है, क्योंकि जो भी बनेगा, वह तो कर्ता ही रहेगा। कृत्य मात्र कर्ता का ही निर्माण करता है। तुम जो भी प्रश्न पूछ रहे हो, वह मौलिक रूप से गलत है। मैं क्या करुं? कैसे अकर्ता होऊं? कैसे बनूं उसकी बांसुरी? कैसे हटाऊं 'मैं-भाव' को? कैसे पहचानूं कि उसका निर्णय है? इन सब के पीछे तुम मौजूद हो। यह कौन है, जो उसकी बांसुरी बनना चाहता है? यह कौन है जो कहता है, कैसे 'मैं-भाव' को छोडूं? यही तो कर्ता है।

फिर क्या करें?

करने को कुछ बचता नहीं। फिर क्या करें? बस कर्ता कैसे निर्मित होता है, इस बात को समझ लेने से कर्ता धीरे-धीरे अपने आप तिरोहित हो जाता है। कुछ करना नहीं पड़ता। तुम पूछते हो, कैसे बनें उसकी बांसुरी? बांसुरी तुम हो। यह बनने का प्रश्न ही नहीं। यह तुमने मान रखा है कि तुम बांसुरी नहीं हो। बांसुरी तो तुम अभी भी हो। इस क्षण भी वही सुन रहा है तुम्हारे भीतर। वही बोल रहा है। एक क्षण को भी इससे अन्यथा, इससे अलग होने का उपाय नहीं है। जब तुमने पाप किया, जब तुमने पुण्य किया, जब तुम चोर थे, जब तुम साधु बने, हर वक्त वही था। सही किया तो उसी ने, गलत किया तो उसी ने। तुम उससे अलग कैसे हो सकोगे? यह भ्रांति भीतर पड़ी ही है कि, तुम उससे अलग हो। बांसुरी बनने का कोई उपाय नहीं है। तुम हो ही उसकी बांसुरी। इतना ही जानना है बस। यह समझ आते ही तुम अचानक पाओगे कि कर्ता भाव दूर-दूर कहीं रहा ही नहीं। सच तो यह है कि कुछ भी करने की कोशिश करना, चाह रखना कर्ता भाव को जन्म देता है। हमें कुछ बनना ही नहीं, हम पहले से ही वह हैं, जो बनने की इच्छा करते रहते हैं। बस इसी बात को समझते ही क्रांति घटित हो जाती है, परमानंद की। सुख की, सुकून की। प्रेम की। परमात्मा की।

खुद को परमात्मा से अलग समझना मूर्खता

ओशो कहते हैं कि लहरों को देखो सागर में। अलग-अलग मालूम पड़ती है। अगर लहरों को भी तुम्हारे तरह थोड़ी बुद्धि आ जाए, तो हर लहर पूछने लगेगी कि, मैं सागर के साथ एक कैसे हो जाऊं? लहर सागर के साथ एक है। लहर सागर से अलग कैसे हो सकती है। पहले यह तो पूछो, लहर सागर से अलग होकर जी कैसे सकेगी? कभी तुमने लहरों को सागर से अलग करके देखा? बचेगी कैसे? लहरें यदि ऐसा प्रश्न पूछें तो? हम लहर को कहेंगे कि पागल, तू समंदर के साथ एक है ही। तेरा यह भ्रम है कि तू अलग है। अलग तू कभी हुई नहीं।

समझ जागते ही दिख जाता है वो!

लहर, जब कभी तू गंदी थी, तो सागर ही गंदा था। जब तुझमें मिट्टी उठी थी, तो सागर से ही उठी थी। जब कभी तुझमें सुखे पत्ते तैरे थे, तो सागर में ही तैरे थे। जब कभी तू बड़ी होकर उठी थी, सागर ही उठा था। छोटी हो कि बड़ी, गंदी हो कि उजली, सुंदर हो कि कुरूप, हर हाल, हर स्थिति में सागर ही तेरे भीतर बोला था। साघर ही तेरे भीतर प्रकट हुआ था। सागर से जुदा होने का, खुद को सागर से अलग सोचने का कोई उपाय है ही नहीं। तू सागर ही है। इसी तरह आत्मा को खुदको परमात्मा से अलग मानना है। हम उससे अलग नहीं। आत्मा ही परमात्मा नामक सागर की बूंद है। यह बूंद उस सागर से अलग हो ही नहीं सकती। बूंदें खुद को समंदर से अलग घोषित नहीं कर सकतीं, आप भी, आत्मा भी खुद को परमात्मा से अलग कैसे मान सकती है? कोई तरीका ही नहीं है। कोई तरकीब नहीं है, खुद को उससे अलग मानने की। आप उसी से निकले हैं। उसी से आए हैं। उसी का अंश है। आपका मूल स्रोत वही है। या यों कहें आप वही हैं। इसे समझने की भर की देर है बस। समझ की किरण से सोच को प्रकाशित करने की देर भर है बस। जब नासमझी की धूल छटेगी, तब परमात्मा की तस्वीर स्पष्ट दिखने लगेगी। वह महसूस होने लगेगा। लहरें समुद्र को देखने की बात करें, उसमें मिलने की बात करें, तो आप क्या कहेंगे? ठीक वैसे ही आपका परमात्मा को पाने की कोशिशें करना वैसा ही है। यही बात ओशो ने अष्टावक्र की गीता से समझाई है। तुम उससे अलग नहीं। तुम ही वह हो।

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