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Somnath Swabhiman Parv 2026: जब चंद्रमा ने पाई नई जिंदगी, जानिए क्यों कहलाता है सोमनाथ पहला ज्योतिर्लिंग

Somnath Swabhiman Parv 2026 के मौके पर जानिए सोमनाथ मंदिर की वो पौराणिक कथा, जहां चंद्रदेव ने भगवान शिव की तपस्या कर श्राप से मुक्ति पाई और यह स्थान पहला ज्योतिर्लिंग कहलाया।

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भारत

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Manoj Vashisth

May 11, 2026

Somnath Swabhiman Parv 2026

Somnath Swabhiman Parv 2026 : सोमनाथ मंदिर का पौराणिक रहस्य: चंद्रदेव की तपस्या से बना प्रथम ज्योतिर्लिंग (फोटो सोर्स: AI@Gemini)

Somnath Temple Latest News: हिंदू धर्म में सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि आस्था, तपस्या और पुनर्जन्म की सबसे अद्भुत कहानियों में से एक का प्रतीक है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब चंद्रदेव (सोम) राजा दक्ष के श्राप के कारण अपनी चमक और शक्ति खो बैठे, तब उन्होंने प्रभास क्षेत्र में भगवान शिव की कठोर तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें श्राप से मुक्ति दी और पुनर्जीवन का वरदान दिया। यही कारण है कि इस पावन धाम को ‘सोमनाथ’ कहा गया और इसे पृथ्वी का पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। सदियों बाद भी यह स्थान केवल श्रद्धा का केंद्र नहीं, बल्कि विश्वास की उस शक्ति का प्रतीक है जो अंधकार के बाद भी नई रोशनी लेकर आती है।

अमृत पर्व: क्यों खास है यह अवसर? (Somnath Swabhiman Parv 2026)

इस साल हम सोमनाथ स्वाभिमान पर्व मना रहे हैं, जो दो ऐतिहासिक पड़ावों का संगम है:

विनाश पर विजय के 1000 वर्ष

साल 1026 में महमूद गजनवी के पहले हमले से शुरू हुआ विध्वंस का सिलसिला भारत की आत्मा को नहीं तोड़ सका। 1000 साल बाद भी यह मंदिर अपनी पूरी भव्यता के साथ खड़ा है।

पुनरुद्धार के 75 वर्ष

आजादी के बाद साल 1951 में लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के संकल्प से इस मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ था। आज उस ऐतिहासिक प्राण-प्रतिष्ठा के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूरे हो रहे हैं।

इस गौरवशाली अवसर को यादगार बनाने के लिए पीएम मोदी ने 75 रुपये का स्मारक सिक्का जारी करने का निर्णय लिया है।

डिजाइन: सिक्के के एक तरफ सोमनाथ मंदिर की आकृति है।
संदेश: इस पर अंकित है ‘भारत की अटूट आस्था और भक्ति के 1000 वर्षों का उत्सव’।
निर्माण: इसे कोलकाता की सरकारी टकसाल (Mint) में तैयार किया गया है।

क्यों खास है सोमनाथ का यह 'स्वाभिमान पर्व'?

श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक "तॉंस्तितिक्षस्व भारत" (हे भरतवंशी, इन्हें सहन करो) की सीख को सोमनाथ ने असल जिंदगी में जीकर दिखाया है । सदियों तक इस मंदिर ने विनाश और निर्माण के अनगिनत चक्र देखे, लेकिन अपनी आंतरिक शांति और गरिमा को कभी खोने नहीं दिया ।

ज्ञान की बात: भारतीय मंदिर वास्तुकला के तीन अद्भुत रूप

सोमनाथ की भव्यता को समझने के लिए भारत की मंदिर निर्माण शैलियों को जानना जरूरी है। मुख्य रूप से ये तीन प्रकार की होती हैं:

नागर शैली (उत्तर भारत): सोमनाथ मंदिर इसी शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसमें मंदिर एक ऊंचे चबूतरे (जगती) पर होता है और शिखर ऊपर की ओर नुकीला होता जाता है।
द्रविड़ शैली (दक्षिण भारत): यहां मंदिरों की पहचान उनके विशाल प्रवेश द्वार (गोपुरम) और पिरामिड नुमा विमान से होती है।
वेसर शैली (मध्य भारत): यह नागर और द्रविड़ दोनों शैलियों का मिश्रण है।

इतिहास के पन्नों से: जब श्रद्धा ने शक्ति को हराया

सोमनाथ का इतिहास केवल हमलों की दास्तां नहीं है, बल्कि यह तितिक्षा (सहनशक्ति) का सबसे बड़ा उदाहरण है

वीर हमीरजी गोहिल का बलिदान: इतिहास की किताबों से इतर, लोक कथाओं में अमर वीर हमीरजी गोहिल जैसे योद्धाओं ने बिना किसी जीत की उम्मीद के, केवल अपने राजधर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए प्राण न्यौछावर कर दिए ।

सरदार पटेल का संकल्प: 12 नवंबर 1947 को, आजादी के महज कुछ महीनों बाद, सरदार वल्लभभाई पटेल ने प्रभास पाटन की लहरों के बीच संकल्प लिया था कि स्वतंत्र भारत सोमनाथ का पुनर्निर्माण करेगा ।

संवैधानिक गौरव: 11 मई 1951 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में जब प्राण-प्रतिष्ठा हुई, तो दुनिया ने देखा कि भारत अपनी विरासत को लोकतांत्रिक और पारदर्शी मूल्यों के साथ सहेज रहा है

धार्मिक और वैज्ञानिक संगम: प्रभास क्षेत्र

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, स्वयं चंद्रमा (सोम) ने राजा दक्ष के श्राप से मुक्ति पाने के लिए यहां तपस्या की थी, जिसके बाद भगवान शिव ने उन्हें पुनर्जीवन दिया। इसी कारण यह प्रथम ज्योतिर्लिंग कहलाया .

खास बात: सोमनाथ वह स्थान है जहां शैव और वैष्णव परंपराओं का मिलन होता है । यहां भगवान कृष्ण की नीजधाम प्रस्थान लीला (भालका तीर्थ) भी संपन्न हुई थी, जहां से उन्होंने अपनी पृथ्वी की यात्रा समाप्त की थी

आपकी सोमनाथ यात्रा: कुछ जरूरी बातें

यदि आप इस पावन भूमि के दर्शन का मन बना रहे हैं, तो इन जानकारियों को नोट कर लें:

शुभ समय: दर्शन के लिए सुबह 7:00 से दोपहर 12:00 और शाम 4:00 से 7:00 बजे का समय सबसे उत्तम है । शाम की आरती के समय मंदिर का दृश्य अलौकिक होता है क्योंकि यह अस्त होते सूरज की सीध में है ।

सोमनाथ का संदेश: तितिक्षा

श्रीमद्भगवद्गीता के एक श्लोक का जिक्र करते हुए सोमनाथ की कहानी समझी जा सकती है सुख-दुख, सर्दी-गर्मी आते-जाते रहते हैं, लेकिन जो अडिग रहता है वही विजेता है। सोमनाथ ने सदियों तक हमलों के घाव सहे, लेकिन कभी कड़वाहट नहीं पाली। आज का सोमनाथ न केवल एक मंदिर है, बल्कि एक जीवंत तीर्थ है जो सिखाता है कि कैसे शून्य से शिखर तक का सफर तय किया जाता है।