
Ram Rajya Meaning : आज के समय में रामराज्य कैसे संभव है (फोटो सोर्स: Gemini AI)
Ram Rajya Meaning : रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा वर्णित रामराज्य केवल एक धार्मिक कल्पना नहीं, बल्कि आदर्श शासन व्यवस्था का जीवंत चित्र है। यह ऐसा समाज दर्शाता है जहां न कोई शत्रुता है, न दुख, न अन्याय और न ही असमानता। हर व्यक्ति सुखी, स्वस्थ और नैतिक जीवन जीता है।
आज के समय में जब हम सुशासन और विकास की बात करते हैं, तब रामराज्य की अवधारणा और भी प्रासंगिक हो जाती है। इस लेख में हम तुलसीदास के रामराज्य के वर्णन को समझते हुए यह जानने का प्रयास करेंगे कि आधुनिक शासन व्यवस्था में किन मूल सिद्धांतों को अपनाकर हम उस आदर्श के करीब पहुँच सकते हैं।
'बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप विषमता खोई।
दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।।
अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा।
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।।'
अर्थात् राम-राज्य यानी सुशासन का प्रताप ये है कि कोई किसी का शत्रु नहीं है, सभी प्राणी मिल-जुलकर रहते हैं। सामान्य जनमानस शारीरिक, मानसिक और दैविक विकारों से मुक्त हो चुका है। सभी स्वस्थ हैं, राम-राज्य में किसी की भी अल्पमृत्यु नहीं होती। कोई निर्धन नहीं है, कोई दु:खी नहीं है, कोई अशिक्षित नहीं है, किसी के भी अन्दर कोई अनैतिक लक्षण नहीं हैं।
उपरोक्त पर विचार करने के बाद मेरे हिसाब से कम से कम निम्न बिन्दुओं पर यदि सरकारें खरी उतरती हैं तो हम मान सकते हैं कि हम राम राज्य की ओर सफलतापूर्वक बढ़ रहे हैं -
हर कार्य कानून सम्मत सम्पन्न होना अति आवश्यक। तभी हम गर्व से कह सकते हैं कि अमूक राज्य में विधि का शासन है।
बिना किसी भेद-भाव के सभी समुदायों में सभी का सब तरह से स्वागत । सभी के विचारों को विश्लेषण में परख कर क्रियान्वित करना ।
सभी नागरिकों की हर क्षेत्र में हर प्रकार से सहभागिता सुनिश्चित होनी आवश्यक।
लोकतांत्रिक मूल्यों को ध्यान में रख प्रत्येक नागरिक के प्रति, हर तरह से विचार कर, उसको संकट मुक्त करना।
चूंकि हर समूह में विचारों की भिन्नता होना स्वाभाविक है इसलिये हर निर्णय में सबकी भागीदारी पश्चात अन्तिम निर्णय में बहुमत का क्रियान्वयन होना आवश्यक।
सही प्रक्रिया अपनाते हुये संस्थाएँ सभी उपलब्ध संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग कर ऐसे परिणाम पर एकमत हों जिससे समाज की आवश्यकता पूरी हो सके।
किसी भी प्रकार के निर्णय को सभी को सब तरह से जाँचने का अधिकार (ताकि कोई भी किसी भी प्रकार का संशय प्रकट न कर पाये)।
किसी भी तरह के निर्णय पर किसी भी हितधारक द्वारा किसी भी प्रकार के प्रश्न का समूचित उत्तर दे उसे संतुष्ट करना आवश्यक।
अब यह पाठकों को निर्णय करना है कि आज के परिप्रेक्ष्य में कौन सी सरकार किस पायदान पर है। हालांकि हमारे भारत देश में अनेकों बार रामराज्य का सुख हमारे पुरखों ने भोगा ही नहीं बल्कि अपनी रचनाओं में उल्लेखित भी किया है। आप सभी को याद दिलाते हुये कुछ शासकों के नाम बताना चाहूँगा जिसमें प्रभु श्रीरामचन्द्र जी के रामराज्य के हजारों साल पहले त्रेतायुग में राजा भरत के शासन काल में ही उनके नाम से हमारे देश का नामकरण भारतवर्ष हुआ था।
प्रभु श्रीरामचन्द्र जी के रामराज्य के बाद महाभारत काल में भी एक राजा भरत के शासन की प्रशंसा हुई है। इसी तरह और भी रामराज्य प्रदान करने वाले शासक हुए जिनके नाम से आप सभी परिचित भी होंगे उदाहरणार्थ राजा हरिश्चन्द्र, राजा युधिष्ठिर, सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य, सम्राट अशोक, सम्राट विक्रमादित्य, चन्द्रगुप्त द्वितीय, राजा हर्षवर्धन, राजा भोज वगैरह।
आजकल सुराज व सुशासन की बात तो सभी करते हैं जबकि सबसे पहले हम सभी को रामचन्द्रजी की तरह बनने की आवश्यकता है। यहां रामचन्द्रजी जैसा बनने से तात्पर्य यही है कि हम अपने व्यवहार में सबसे पहले सदाचार तो अपनायें। यदि ऐसा होता है तो बाकी गुण भी विकसित होने में देर नहीं लगेगी। मैं समझता हूँ मेरा ऐसा सोचना/लिखना आप समझ गये होंगे अर्थात यदि सभी रामचन्द्रजी जैसे बनने का प्रयास करेंगे तो कम से कम सुराज व सुशासन की ओर एक कदम होना तय है।सुराज व सुशासन कुछ साल सही ढंग से चल निकले उसके बाद रामराज की स्थापना करने में आसानी हो जायेगी।
गोवर्द्धन दास बिन्नाणी
Published on:
26 Mar 2026 02:59 pm
बड़ी खबरें
View Allधर्म और अध्यात्म
धर्म/ज्योतिष
ट्रेंडिंग
