
रोहिणी व्रत कथा
यह व्रत जैन समुदाय का प्रमुख व्रत है। इसे स्त्रियां और पुरुष दोनों ही रखते हैं, महीने के जिस दिन रोहिणी नक्षत्र पड़ता है, जैन समुदाय उसी दिन यह व्रत रखता है। इसका पारण रोहिणी नक्षत्र की अवधि की समाप्ति पर मार्गशीर्ष नक्षत्र में होता (Rohini Vrat Katha) है और इसका फलाहार सूर्यास्त से पहले कर लिया जाता है। मान्यता है कि यह व्रत कर्म बंधन से छुटकारा दिलाता है। साथ ही महिलाएं पति की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य के लिए यह व्रत रखती हैं।
फरवरी में शुक्ल पक्ष की अष्टमी की तिथि 27 फरवरी को सुबह 8.43 बजे से हो रही है और यह तिथि 28 फरवरी को सुबह 9.59 बजे संपन्न हो रही है। कुछ पंचांग में मासिक रोहिणी व्रत 28 फरवरी मंगलवार को रखे जाने की बात कही गई है। वहीं दृक पंचांग में 27 दिन में एक बार आने वाले सूर्योदय के बाद रोहिणी नक्षत्र के दिन 27 फरवरी को रोहिणी व्रत रखा जाना चाहिए। इस दिन जैन समाज भगवान वासु पूज्य की पूजा की जाती है।
प्राचीन कथा के अनुसार चंपापुरी राज्य में राजा माधवा, और रानी लक्ष्मीपति का राज्य था। उनके सात बेटे और एक बेटी थी। एक बार राजा ने बेटी रोहिणी के बारे में ज्योतिषी से जानकारी ली तो उसने बताया कि रोहिणी का विवाह हस्तिनापुर के राजकुमार अशोक के साथ होगा। इस पर इसके बाद राजा ने स्वयंवर का आयोजन किया, इसमें रोहिणी-अशोक का विवाह करा दिया गया। बाद में रोहिणी-अशोक राजा रानी बने।
एक समय हस्तिनापुर के वन में श्री चारण मुनिराज आए, उनके दर्शन के लिए राजा पहुंचे और धर्मोपदेश ग्रहण किया। बाद में पूछा कि उनकी रानी शांतचित्त क्यों है, तब उन्होंने बताया कि इसी नगर में एक समय में वस्तुपाल नाम का राजा था, जिसका धनमित्र नाम का मित्र था, जिसकी दुर्गंधा नाम की कन्या पैदा हुई। लेकिन धनमित्र परेशान रहता था कि उसकी बेटी से विवाह कौन करेगा। लेकिन बाद में उसने धन का लालच देकर वस्तुपाल के बेटे श्रीषेण से दुर्गंधा का विवाह कर दिया। इधर दुर्गंधा की दुर्गंध से परेशान होकर श्रीषेण एक माह में ही कहीं चला गया।
इसी समय अमृतसेन मुनिराज वहां आए। धनमित्र और दुर्गंधा उनके दर्शन के लिए पुहंचे। यहां धनमित्र ने दुर्गंधा के भविष्य के विषय में पूछा तो उन्होंने बताया कि गिरनार पर्वत के पास एक नगर में भूपाल नाम के राजा का राज्य था। राजा की सिंधुमती नाम की रानी थी। एक दिन राजा रानी वन जा रहे थे, तभी मुनिराज को देखा तो रानी को घर लौटकर आहार की व्यवस्था करने को कहा। रानी घर तो लौट आई लेकिन गुस्से में मुनिराज के लिए कड़वी तुम्बी का आहार तैयार कराया, इससे मुनिराज को बहुत कष्ट और उनकी मृत्यु हो गई।
राजा को इसका पता चला तो उन्होंने रानी को महल से निकाल दिया। पाप के कारण रानी को कोढ़ भी हो गया और आखिर में उसकी मृत्यु हो गई और नर्क में गई। यहां दुख भोगने के बाद पहले वह पशु योनि में उत्पन्न हुई और बाद में तुम्हारे घर दुर्गंधा नाम की कन्या के रूप में पैदा हुई। इस पर धनमित्र ने ऐसे व्रत के बारे में पूछा जिससे उसका पाप कटे, जिसपर मुनि अमृतसेन ने उन्हें रोहिणी व्रत का महत्व और विधि बताई। दुर्गंधा ने ऐसा ही किया और संन्यास व मृत्यु के बाद स्वर्ग गई, वहां से तुम्हारी रानी बनी।
इसके बाद राजा अशोक ने अपनी कहानी के बारे में पूछा तो मुनिराज ने बताया कि भील के जन्म में तुमने भी मुनिराज को कष्ट दिए थे। इससे मृत्यु के बाद नर्क होते हुए और कई योनियों में भ्रमण करते हुए व्यापारी के घर पैदा हुए। इसके बाद मुनिराज के बताने पर रोहिणी व्रत किया और अगले जन्म में राजा बने। इस तरह राजा, रानी रोहिणी व्रत के प्रभाव से मोक्ष को प्राप्त किए।
Updated on:
15 Jun 2024, 2:57 PM IST
Published on:
27 Feb 2023, 1:29 PM IST
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