
Vat Purnima 2026 : वट पूर्णिमा 2026 पर 13 घंटे का भद्रा काल (फोटो सोर्स : AI@chatgpt)
Jyeshtha Purnima 2026 : इस वर्ष का ज्येष्ठ महीना बेहद असाधारण साबित हुआ है। सौर और चंद्र मास के अनोखे मेल से अधिकमास बना, जिसकी वजह से पावन महीना पूरे 60 दिनों का हो गया। 29 जून 2026, सोमवार को ये महीना पूरा होगा। धार्मिक नजरिए से भी यह दिन अलग ही रंग लेकर आया है क्योंकि इसी दिन सुहागिन औरतों का सबसे बड़ा त्यौहार वट पूर्णिमा व्रत भी है, और गंगा-यमुना जैसी पुण्य नदियों में स्नान-दान (Purnima Snan Daan) की पूर्णिमा भी। दोनों पर्व एक साथ पड़ रहे हैं, तो उत्साह भी दोगुना है।
लेकिन, इन पर्वों के संयोग में एक मुश्किल भी आ गई है भद्रा का साया। सही मायने में पूरे 13 घंटे तक भद्रा काल रहेगा, जो खगोल और ज्योतिष के लिहाज से किसी चुनौती से कम नहीं। द्रिक पंचांग की मानें तो 29 जून को सुबह 03:06 से भद्रा शुरू होगी और शाम तक चलेगी। शास्त्रों में तो साफ कहा गया है कि भद्रा के दौरान नए या शुभ कामों की शुरुआत नहीं करनी चाहिए। ऐसे में श्रद्धालुओं और व्रती महिलाओं के सामने बड़ा सवाल है आखिर पूजा और वट वृक्ष की पूजा का शुभ समय क्या होगा? इसी उलझन में सब इस अनोखे महासंयोग का सामना कर रहे हैं।
ज्योतिषीय गणना के अनुसार, 29 जून 2026 की तड़के सुबह 03:06 बजे से ही भद्रा का प्रवेश हो जाएगा, जो दोपहर बाद 04:16 बजे तक प्रभावी रहेगा। इस अवधि में नए व्यापार का आरंभ, गृह प्रवेश, मुंडन संस्कार अथवा किसी भी तरह का शुभ संकल्प पूरी तरह वर्जित रहेगा।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भद्रा काल केवल सांसारिक मांगलिक कार्यों को प्रभावित करता है। भगवान नारायण की आराधना, सत्यनारायण व्रत कथा, पवित्र नदियों में स्नान, मंत्रों का जप और मानसिक तप करने पर भद्रा का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता। इसलिए सुहागिन महिलाएं सुबह से ही अपने व्रत के नियमों का पालन कर सकती हैं, किंतु वट वृक्ष की मुख्य पूजा और कथा का श्रवण भद्रा समाप्ति के पश्चात या गोधूलि वेला में करना विशेष फलदायी रहेगा।
ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन त्रिवेणी संगम या गंगाजी में स्नान का अनंत गुना फल बताया गया है। यदि नदियों तक जाना संभव न हो, तो घर पर ही नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर स्नान करना भी उतना ही पवित्र माना जाता है। इस दिन तामसिक भोजन (प्याज, लहसुन, मांस-मदिरा) का त्याग अनिवार्य है। धार्मिक मान्यता है कि सायंकाल में जब चंद्रदेव उदित होंगे, तब उन्हें दूध मिश्रित जल से अर्घ्य देने से चंद्र दोष शांत हो सकता है।
| विशेष घटना / मुहूर्त | निर्धारित समय (2026) |
| पूर्णिमा तिथि प्रारंभ | 29 जून, सुबह 03:06 बजे |
| पूर्णिमा तिथि समाप्त | 30 जून, सुबह 05:26 बजे |
| ब्रह्म मुहूर्त (स्नान) | सुबह 04:06 से 04:46 बजे |
| अविजीत मुहूर्त | सुबह 11:57 से दोपहर 12:52 |
| भद्रा काल अवधि | सुबह 03:06 से दोपहर 04:16 |
| गोधूलि (पूजा) मुहूर्त | शाम 07:22 से शाम 07:42 बजे |
| चंद्रोदय का समय | शाम 07:16 बजे |
पीपल की महापूजा: पूर्णिमा के दिन पीपल के वृक्ष में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का साक्षात वास होता है। एक तांबे के लोटे में शुद्ध जल भरकर, उसमें थोड़ा कच्चा दूध और बताशा डालकर पीपल की जड़ में अर्पित करें। मान्यता है कि पितृ दोष की शांति के लिए यह उपाय लाभकारी माना जाता है।
धन-संपन्नता से जुड़ा धार्मिक उपाय: इस पावन तिथि पर माता लक्ष्मी के सम्मुख 11 पीली कौड़ियां रखें, उन पर हल्दी से तिलक करें। रात्रि भर इन्हें वहीं रहने दें। अगले दिन सुबह इन्हें एक साफ लाल कपड़े में बांधकर अपनी तिजोरी या धन स्थान पर रख दें। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि इससे आर्थिक समृद्धि की प्राप्ति होती है।
नोट: सनातन धर्म में अधिकमास में ज्येष्ठ पूर्णिमा का आना एक अत्यंत दुर्लभ धार्मिक संयोग मानी जाती है। इसमें किए गए दान का फल अक्षुण्ण रहता है।
अस्वीकरण (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी केवल सामान्य सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। यहाँ दी गई ज्योतिष, वास्तु या धार्मिक जानकारी मान्यताओं और विभिन्न स्रोतों पर आधारित है। हम इसकी पूर्ण सटीकता या सफलता की गारंटी नहीं देते हैं। किसी भी उपाय, सलाह या विधि को अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के प्रमाणित विशेषज्ञ या विद्वान से परामर्श अवश्य लें।
Published on:
26 Jun 2026 02:04 pm
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