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भारत में सिर्फ यहां है महाकाल का दूसरा मंदिर, ये है-लिंग से उपलिंग बनने की कहानी

इसका वर्णन पदम पुराण के पाताल खंड में मिलता है। पदम पुराण के अनुसार त्रेतायुग में बिरसिंहपुर में राजा वीर सिंह का राज्य हुआ करता था।

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maha shivaratri 2018: Story of Gaibinath Shiv Temple Lake Birsinghpur

maha shivaratri 2018: Story of Gaibinath Shiv Temple Lake Birsinghpur

सतना। देशभर के भक्त यही जानते है कि महाकाल का मंदिर सिर्फ उज्जैन में है। लेकिन इसका दूसरा उपलिंग भी है ये ज्यादातर लोग नहीं जानते है। यहां MP.PATRIKA.COM आपको -लिंग से उपलिंग बनने की कहानी बता रहा है। सतना जिला मुख्यालय से तकरीबन 35 किमी. दूर स्थित भगवान गैवीनाथ का मंदिर है। जहां खंडित शिवलिंग की पूजा होती है। इसका वर्णन पदम पुराण के पाताल खंड में मिलता है। पदम पुराण के अनुसार त्रेतायुग में बिरसिंहपुर में राजा वीर सिंह का राज्य हुआ करता था।

उस समय बिरसिंहपुर नगर का नाम देवपुर था। राजा वीर सिंह प्रतिदिन भगवान महाकाल को जल चढ़ाने घोड़े पर सवार होकर उज्जैन दर्शन करने जाते थे। बताया गया कि लगभग 600 वर्षों तक यह सिलसिला चलता रहा। इस तरह राजा वृद्ध हो गए और उज्जैन जाने में परेशानी होने लगी। एक बार उन्होंने भगवान महाकाल के सामने मन की बात रखी।

suresh mishra IMAGE CREDIT: patrika

गैवी यादव मुझे निकलने नहीं देता

बताया जाता है, एक दिन भगवान महाकाल ने राजा को स्वप्न में दर्शन दिए और देवपुर में दर्शन देने की बात कही। इसके बाद नगर के गैवी यादव नामक व्यक्ति घर में एक घटना सामने आई। घर के चूल्हे से रात को शिवलिंग रूप निकलता, जिसे यादव की मां मूसल से ठोक कर अन्दर कर देती। कई दिनों तक यही क्रम चलता रहा। एक दिन महाकाल फिर से राजा को स्वप्न में आए और कहा कि मैं तुम्हारी पूजा व निष्ठा से प्रसन्न होकर तुम्हारे नगर में निकलना चाहता हूं, लेकिन गैवी यादव मुझे निकलने नहीं देता। इसके बाद राजा ने गैवी यादव को बुलाया और स्वप्न की बात बताई। जिसके बाद घर की जगह को खाली कराया गया। राजा ने इसके बाद भव्य मंदिर का निर्माण कराया, महाकाल के ही कहने पर शिवलिंग का नाम गैवीनाथ रख दिया। तब से भोलेनाथ को गैवीनाथ के नाम से जाना जाता है।

suresh mishra IMAGE CREDIT: patrika

चारोधाम का चढ़ता है जल
पौराणिक मन्यताओं के अनुसार यहां चारोधाम से लौटने वाले भक्त भगवान भोलनाथ के दर गैवीनाथ पहुंचकर चारोधाम का जल चढ़ाते है। पूर्वज बतातें है कि जितना चारोधाम में भगवान का दर्शन करने से पुण्य मिलता है। उससे कहीं ज्यादा गवौनाथ में जल चढ़ाने से मिलता है। लोग कहते है कि चारोधाम का अगर जल यहां नहीं चढ़ा तो चारोधाम की यात्रा अधूरी मानी जाती है।

विंध्य क्षेत्र में प्रचलित
मंदिर के पुजारी की मानें तो महाशिवरात्रि के दिन विंध्यभर से भक्त पहुंचते है। इसीतरह मनमास के माह में गैवीनाथ की पूजा का अपना एक महत्व है ही। वैसे तो हर सोमवार को हजारों भक्त पहुंचकर गैवीनाथ की पूजाकर मन्नत मांगते है। गैवीनाथ का प्रताप है कि यहां पर आने वाले हर एक भक्त की मनों कामना पूर्ण होती है।

भक्त मानते है शिव का उपलिंग
आकाल मृत्यु वो मरे, जो काम करे चंडाल का, काल भी उसका क्या करें, जो भक्त हो महाकाल का....। सतना जिले में ये बात बिरसिंहपुर के गैवीनाथ भगवान के लिए बोली जाती है। स्थानीय स्तर पर उनकी पहचान महाकाल के उपलिंग के रूप में होती है। बोला जाता है, जो व्यक्ति महाकाल के दर्शन करने उज्जैन नहीं जा सकता, वे बिरसिंहपुर के गैवीनाथ भगवान का दर्शन कर लें, पुण्य उतना ही मिलेगा।