
shramshree health camp pilot project questions, एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर
Satna Shramshree Health Camp: मध्यप्रदेश के असंगठित श्रमिकों में असंचारी रोगों और व्यावसायिक रोगों की प्रारंभिक पहचान कर 60 वर्ष से कम आयु में होने वाली असामयिक मृत्यु दर में कमी लाने का पायलट प्रोजेक्ट शुरु होने से पहले ही सतना में विवादों में घिर गया है। प्रशासनिक गलियारों में यह भी चर्चा प्रारंभ हो गई है कि एक संस्था विशेष को लाभ देने के लिए यह प्रोजेक्ट तैयार किया गया है। यही वजह है कि पायलट प्रोजेक्ट लॉन्च होने से पहले ही संस्था ने अपना प्रस्ताव शिविर में खर्च होने वाली राशि का ब्यौरा अनुमोदन के लिए शासन को भेज दिया है।
जानकारी के अनुसार असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के मामले में पाया गया है कि काफी संख्या में श्रमिक 60 वर्ष की आयु के पहले ही असमय मौत के शिकार हो जाते हैं। इसके पीछे की मुख्य वजह उनकी बीमारियां होती हैं जो सामान्य तौर पर उन्हें पता नहीं चल पाती है। इसे देखते हुए श्रमश्री स्वास्थ्य शिविर का पायलट प्रोजेक्ट सतना जिले को दिया गया है। इसके साथ ही इस प्रोजेक्ट के लिए 20 लाख रुपए की राशि भी आवंटित कर दी गई है।
शिविर के पहले चरण में श्रमिकों का शारीरिक माप करने के साथ ही उनकी आदतों और नशे की लत आदि का पता लगाया जाएगा। इसके बाद यह तय किया जाएगा कि उन्हें चिकित्सकीय सहायता की जरूरत है या नहीं। जरूरतमंदों का चिकित्सकीय परीक्षण कराया जाकर आवश्यक होने पर अस्पताल में भर्ती कराया जाएगा। गंभीर बीमारी होने पर उन्हें उच्च चिकित्सा संस्थाओं में भेजा जाएगा। इसमें प्रस्ताव यह है कि स्वास्थ्य एवं जीवन शैली संबंधी जानकारी व्यक्ति, ग्राम पंचायत, क्लस्टर, स्वास्थ्य संस्था स्तर से एकत्र की जाएगी। जानकारी एकत्र करने के बाद इन्हें एकीकृत सूचनातंत्र में दर्ज किया जाएगा।
पायलट प्रोजेक्ट लॉन्च करने के साथ ही स्वास्थ्य विभाग ने शिविर संचालन को अतिरिक्त मानव संसाधन के साथ व्यवहारिक होने से इंकार कर दिया है। लिहाजा थर्ड पार्टी को शिविर संचालन का काम देने की बात कही गई है। सवाल यह है कि जब यह पायलट प्रोजेक्ट है तो इसे शुरू किया जाता और आने वाली कठिनाइयों का पता चलने पर सुधार किया जाता, इसीलिये पायलट प्रोजेक्ट शुरू होते हैं। ऐसे में बिना कार्य किए स्वास्थ्य विभाग ने कैसे इंकार कर दिया।
इस मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि अभी प्रोजेक्ट प्रारंभ ही नहीं हुआ है और चित्रकूट की संस्था डीआरआई ने श्रम विभाग के प्रमुख सचिव रघुराज राजेन्द्रन को पायलट प्रोजेक्ट संचालन और वित्तीय स्वीकृति का प्रस्ताव भी भेज दिया। चौंकाने वाली बात यह है कि इसमें शिविरों के आयोजन एवं डेटाबेस निर्माण तथा कार्यक्रम प्रबंधन ईकाई के सुचारू संचालन के लिए आवश्यक वित्तीय अनुदान की स्वीकृति सहित स्वास्थ्य विभाग, महिला बाल विकास विभाग, कृषि विभाग एवं स्थानीय प्रशासन को समेकित सेवाओं के दिशा निर्देश देने की भी बात कह दी। जबकि अभी तक यह प्रोजेक्ट उन्हें स्वीकृत ही नहीं हुआ है और उन्होंने अनुमोदन प्रदान करने की बात कही है। इसके साथ ही प्रति शिविर में 82500 रुपए व्यय होने की जानकारी देते हुए इसे अनुमोदित करने का प्रस्ताव दिया है।
इस प्रोजेक्ट को शासन स्तर पर पहले से ही निजी हाथों में देने की व्यवस्था की गई है, जबकि विभागीय स्तर पर आसानी से कम खर्च पर इसे किया जा सकता था। हालांकि इस मामले में स्पष्ट कहा गया है कि कैंप इंप्लीमेंटेंशन एजेंसी (कैंप आयोजित करने वाली एजेंसी) का निर्धारण राज्य अथवा जिला स्तर पर पारदर्शी प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया के माध्यम से होना है। ऐसे में अभी तक निविदा आमंत्रित नहीं की गई फिर ये काम अनुमोदित करने का प्रस्ताव कैसे तैयार होकर चला गया।
इस मामले में श्रम विभाग के उच्चाधिकारियों की भूमिका संदिग्ध नजर आ रही है। इसे लेकर जिला स्तर पर संबंधित सभी अधिकारियों से सवाल किए गए लेकिन किसी ने भी इस संबंध में कुछ भी कहने से इंकार कर दिया है। बस यह कहा गया कि अभी किसी को काम नहीं दिया गया है और टेंडर भी नहीं हुआ है।
Updated on:
08 Aug 2026 10:32 pm
Published on:
08 Aug 2026 10:32 pm
