
गोबर गैस प्लांट के साथ और गैस चूल्हा जलाकर दिखाते किसान जानकीलाल मीणा (फोटो-पत्रिका)
सवाईमाधोपुर: घरेलू गैस सिलेंडरों की बढ़ती कीमतें और रिफिलिंग की मारामारी से आम आदमी का बजट लगातार बिगड़ रहा है। शहरों से लेकर गांवों तक लोग गैस सिलेंडर की कमी और महंगाई से जूझ रहे हैं।
ऐसे समय में सूरवाल कस्बे का एक किसान परिवार आत्मनिर्भरता की ऐसी मिसाल पेश कर रहा है, जिसने बीते दो दशकों से गैस सिलेंडर की जरूरत ही नहीं महसूस की। प्रगतिशील किसान जानकीलाल मीणा ने साल 2005 में वन विभाग के सहयोग से अपने फार्म हाउस पर गोबर गैस प्लांट स्थापित किया था।
इस प्लांट ने उनकी रसोई को गैस सिलेंडर संकट से मुक्त कर दिया और साथ ही खेती में जैविक खाद का उपयोग कर उत्पादन बढ़ाने तथा पर्यावरण संरक्षण की दिशा में नई राह दिखाई। सूरवाल का यह उदाहरण आज ग्रीन एनर्जी के दौर में ग्रामीण आत्मनिर्भरता का आदर्श मॉडल बन गया है।
जानकीलाल मीणा ने लगभग बीस साल पहले 2005 में अपने फार्म हाउस पर एक गोबर गैस प्लांट स्थापित किया था। इस प्लांट को स्थापित करने में वन विभाग ने पूर्ण सहयोग किया था। उन्होंने अपने बड़े परिवार की जरूरतों को देखते हुए तीन घन मीटर का एक पक्का गड्ढा बनवाया था।
किसान मीणा के अनुसार, यह तकनीक इतनी सरल और प्रभावी है कि तब से लेकर आज तक उनकी रसोई में चूल्हा कभी ठंडा नहीं पड़ा। परिवार के सात सदस्यों का खाना रोजाना बस कुछ तगारी गोबर डालने से आसानी से बन जाता है, जिसमें न तो धुएं का झंझट है और न ही कोई बदबू। इस व्यवस्था से प्रतिमाह लगभग एक हजार रुपए की बचत भी हो रही है।
यह प्लांट केवल गैस ही नहीं बल्कि उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद भी प्रदान करता है, जिसे मीणा 'सफेद सोना' कहते हैं। साल में दो बार गड्ढे से निकाला जाने वाला गोबर उच्च गुणवत्ता वाली वर्मी कम्पोस्ट बन चुका होता है।
मीणा बताते हैं कि इस जैविक खाद को खेती में डालने से पैदावार में चार गुना तक बढ़ोतरी हुई है और रासायनिक खाद का खर्च भी बच रहा है। प्लांट के संचालन के लिए दो भैंस और एक पाड़ी से प्राप्त गोबर का उपयोग किया जाता है। साल 2005 से गोबर गैस आधारित चूल्हे पर खाना पकाने वाला यह प्लांट आज भी फर्स्ट क्लास स्थिति में है।
Updated on:
24 Apr 2026 02:57 pm
Published on:
24 Apr 2026 02:57 pm
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