
नई दिल्ली। वातावरण में बढ़ते तापमान के कारण हिमालय पर इसका बुरा असर पड़ रहा है। इस वजह से धरातल की पलेटे खिसकने के कारण कई क्षेत्रों में भूकंप अधिक आने लगें हैं। कुछ वर्षों पहले भूकंप के कारण कई लोगों की जाने चली गई थी। जिसको लेकर सरकार बिलकुल भी तैयार नहीं थी। बावजूद इसके भारत ने अब भी आने वाली आपदा के लिए कोई तैयारी नहीं की।
वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालय क्षेत्र में भविष्य में कभी भी 8.5 की तीव्रता की गति से भूकंप आ सकता है। इसके लिए भारत जान-माल की क्षति को न्यूनतम करने की कोई रणनीति नहीं बना रहा है। बीते हफ्ते में हुई वैज्ञानिकों की मिटिंग में कहा है कि सरकार को भूकंप संबंधी सुरक्षा करने के लिए अपनी कमर कस लेनी चाहिए।
बता दें कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान में बीते 18-20 अप्रैल को आयोजित 'हिमालय में जलवायु परिवर्तन और अतिशय घटनाएं' विषयक अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला का लक्ष्य हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन, हिमनदों के पिघलने, आदि कि घटनाओं में हो रही वृद्धि और फसलों के जलने पर हो रहे वायुमंडलीय प्रदूषण के मुद्दों पर चर्चा की गई।
इस कार्यशाला में जिन विविध विषयों पर चर्चा हुई, उनमें से एक यह था कि हिमालयी क्षेत्र में किसी बड़ी आपदा आने पर जान-माल का नुकसान कम करने की तैयारी नहीं है। लेकिन आईआईटी रूड़की समेत कई अनुसंधान ग्रुप भूकंप की पूर्व चेतावनी से निपटने और विकसित करने में जुटे हैं ताकि लोगों को भूकंप आने से कुछ समय पहले उसके बारे में चेतावनी दी जा सके।
गौरतलब है कि लातूर में 1993 में भूकंप से 9000 से अधिक लोग मर गए थे और सरकारी एजेंसियों एवं विद्वानों की राय थी कि मकान कच्चे थे। उन्होंने कहा, 'ऐसे में लोगों की मौत को उनकी गरीबी से जोड़कर देखा गया।' उन्होंने कहा, '2001 में जब भुज में भूकंप आया तब अहमदाबाद में 120 बहुमंजिली इमारतें ढह गयीं और 900 लोग मर गए। ये सारे इंजीनियरीकृत ढांचे थे। जांच में सामने आया कि भवन निर्माण नियमावली का उल्लंघन हुआ था।
Published on:
29 Apr 2019, 11:13 AM IST
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