भारतीय महिला वैज्ञानिक ने बनाई ऐसी कृत्रिम त्वचा जिसे महसूस होता है दर्द

भारतीय वैज्ञानिक मधु भास्करन की बनाई इस आर्टिफिशियल स्किन का उपयोग अधिक स्मार्ट रोबोट और कृत्रिम अंग बनाने में किया जा सकता है

By: Mohmad Imran

Published: 07 Sep 2020, 12:55 PM IST

ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न स्थित आरएमआइटी विश्वविद्यालय (RMIT University, Melborn) के वैज्ञानिकों ने ऐसी कृत्रिम त्वचा (Artificial Intelligence) विकसित करने में सफलता पाई है जिससे इंसानों की ही तरह दर्द महसूस (Artificial Skin that Feels Pain) होता। इतना ही नहीं यह दर्द के प्रति प्रतिक्रिया (React to the Pain) भी करती है और नोचने काटने या चोट लग जाने पर लाल पड़ जाती है। इसे बनाने वाली भारतीय मूल की वैज्ञानिक और प्रमुख शोधकर्ता प्रो. मधु भास्करन का कहना है कि यह कृत्रिम त्वचा भविष्य के इंसानों जैसे दिखने वाले स्मार्ट ह्यूमनॉएड रोबोट (Smart Humonoid Robots) और बेहतर कृत्रिम अंग (Prosthetics) बनाने में उपयोगी साबित होगी।

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ऐसे काम करती है यह त्वचा
भास्करन और उनकी टीम ने जो प्रोटोटाइप (Prototype) विकसित किया है वह इलेक्ट्रॉनिक सेंसर (Electronic Sensors) की मदद से मानव त्वचा की ही तरह दर्द को महसूस कर सकती है और इस पर उसी तरह प्रतिक्रिया करती है। यह खास स्किन दरअसल, हमारी त्वचा की सबसे तीव्र प्रतिक्रिया की नकल करती है और प्रकाश की गति (Light Speed) से उन तंत्रिका संकेतों (Nerv Signals) की तरह प्रतिक्रिया कर सकती है जो हमारे दिमाग तक दर्द होने का अहसास कराती हैं। भास्करन का कहना है कि यह अगली पीढ़ी की बायोमेडिकल तकनीकों (Biomedical) और बुद्धिमान रोबोट्स (Smart Robots) का इंसानों की तरह भावनाएं व्यक्त करने की ओर पहला कदम है। त्वचा हमारे शरीर की सबसे संवेदनशील अंग है जिसके जटिल डिजायन के कारण हम पलक झपकते ही चोट, दर्द , रोमांच, सिहरन और ठंडा या गर्म महसूस करते हैं।

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तीन तकनीकों का संगम है त्वचा
भास्करन ने बताया कि टीम ने कृत्रिम त्वचा बनाने के लिए अपनी ही तीन अलग--अलग तकनीकों को मिलाया है। सबसे पहले स्ट्रेचेबल इलेक्ट्रॉनिक्स जिन्हें एक पारदर्शी औैर न टूटने वाले ऑक्साइड सामग्री एवं बायोकॉम्पैटिबल सिलिकॉन के संयोजन से बनाया गया है। इसके अलावा हमाारे बाल से 1000 गुना पतली तापमान औैर दबाव के प्रति संवेदनशील कोटिंग्स को इस त्वचा पर चढ़ाया गया है जो खुद गर्मी पाते ही आकार बदल (Shape Shifter) लेती हैं। इसके बाद उन्होंने इसे हमारे दिमाग की नकल कररने वाले एक इलेक्ट्रॉनिक मेमोरी सेल्स (Electronic Memory Cells) से जोड़ दिया। यह हमारे दिमाग की ठीक उसी तरह नकल करता है जैसे दिमाग में पहले से ही इकट्ठा की गई जानकारी के आधार पर वह हमें प्रतिक्रिया करने के लिए कहता है।

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Mohmad Imran Desk/Reporting
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