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भारतीय ने बनाई ऐसी चिप जो कैंसर के सेल्स को शरीर में फैलने से पहले पहचान लेगी

भारतीय ने बनाई ऐसी चिप जो कैंसर के सेल्स को शरीर में फैलने से पहले पहचान लेगी -भारतीय मूल के मैकेनिकल इंजीनियर बालाजी पंचपकेन ने नैनेट्यूब से बना एक ऐसा चिप बनाया है जो किसी भी प्रकार की ट्यूमर कोशिकाओं को पहले पहचान सकती है
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जयपुर

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Mohmad Imran

•

Updated: 7 Sep 2019, 7:29 PM IST

भारतीय ने बनाई ऐसी चिप जो कैंसर के सेल्स को शरीर में फैलने से पहले पहचान लेगी

भारतीय ने बनाई ऐसी चिप जो कैंसर के सेल्स को शरीर में फैलने से पहले पहचान लेगी

भारतीय मूल के अमरीकी मैकेनिकल इंजीनियर बालाजी पंचपकेन ने वॉर्सेस्टर पॉलिटेक्निक संस्थान के शोधकर्ताओं के साथ मिलकर कार्बन नैनोट्यूब से बना एक चिप विकसित किया है जो शरीर में मौजूद किसी भी आकार या प्रकार की ट्यूमर कोशिकाओं को पहचानने में सक्षम है। यह चिप उन कोशिकाओं को मौजूदा तकनीकों की तुलना में अधिक सटीकता के साथ पहचान सकती है। इस उपकरण का अनूठा डिजायन न केवल ट्यूमर की आसानी से पहचान करता है बल्कि पहचान की गई कोशिकाओं की प्रकृति और कल्चर की भी जानकारी देता है। इससे शुरुआती चरण के ट्यूमर का पता लगाने, कैंसर के शरीर में फैलने की गति और चिकित्सा के प्रभावों की निगरानी करना भी संभव बनाता है।

कैंसर के शुरुआती इलाज में मिलेगी मदद
ज्यादातर मामलों में केंसर से होने वाली मौतों का कारण कैंसर सेल्स की समय रहते पहचान न हो पाना और इसके एडवांस स्टेज या लाइलाज होने के कारण होती है। यही कारण है कि वैज्ञानिक लंबे समय से एक ऐसी विधि की खोज में थे जिससे शरीर में किसी भी प्रकार के ट्यूमर की कोशिकाओं का पता लगाया जा सके। यह चिप रक्त कोशिकाओं के माध्यम से शरीर में दौड़ रही ट्यूमर कोशिकाओं को आसानी से पकड़ सकते हैं। इस तरह ट्यूमर के विकसित होने के साथ ही उसे पहचानकर तुरंत इलाज कर पाना संभव होगा। जिससे मरीज की जान बचाई जा सकेगी। कैंसर के ट्यूमर की कोशिकाओं में होने वाले आनुवांशिक बदलावों को पहचानना भी संभव होगा।
बालाजी का कहना है कि रक्त के साथ शरीर में दौड़ती 'सर्कुलेटिंग ट्यूमर सैल्स' (सीटीसी) को बारीकी से अलग करना कैंसर की सबसे बड़ी चुनौती है। यह ऐसा है जैसे कई टन भूसे में खोई सूई को ढूंढना है। क्योंकि इन कोशिकाओं में एक अरब रक्त कोशिकाओं के बीच एक से 10 कोशिकाएं होती हैं और ट्यूमर से सीटीसी का लगातार बाहर निकलना इस चुनौती को और बढ़ा देता है। वर्तमान में उपलब्ध उपकरणों की अपनी सीमाएं हैं लेकिन कैंसर सैल्स की नहीं।

ऐसे काम करती है यह चिप
बालाजी और उनकी टीम की बनाई इस चिप का केंद्र बिंदु कार्बन नैनोट्यूब की एक परत है जो सिलिकॉन या ग्लास शीट पर रेखाओं के जरिए सैल्स की मौजूदगी को दर्शाता है। बालाजी का कहना है कि चिप का डिजाइन सीटीसी के प्राकृतिक व्यवहार करने की प्रवृत्ति का विश्लेषण कर सैल्स का पता लगाती है। शरीर के अन्य हिस्सो तक पहुंचने या नए ट्यूमर सैल्स को बनाने के लिए सीटीसी को एक ऐसे वातावरण की जरुरत होती है उसके अनुकूल हो। हाल के अध्ययनों से पता चला है कि सीटीसी पहले की तुलना में कहीं अधिक नाजुक है और रक्त प्रवाह में निहित पर्यावरण और यांत्रिक तनावों के अधीन काम करती हैं। बालाजी के अनुसार सफेद रक्त कोशिकाएं नैनोट्यूब के साथ प्रतिक्रिया नहीं करतीं इसलिए उन्हें आसानी से हटाया जा सकता है। इससे सीटीसी की पहचान करना आसान हो जाता है। यह उपकरण न केवल कैंसर की प्रगति पर नजऱ रखने और विकिरण या कीमोथेरेपी के लिए उनकी प्रतिक्रिया के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण बन सकता है बल्कि कैंसर के संभावित प्रभाव और शरीर में विकसित होने के समय का अनुमान भी लगात सकता है। इससे चिकित्सकों को सबसे प्रभावी इलाज की ओर जाने में मदद मिलती है। बालाजी का कहना है कि उनका बनाया 'कार्बन नैनोट्यूब लिक्विड बायोप्सी चिपÓ का इंसानों पर जल्द ही प्रयोग शुरू किया जाएगा।