भारत की इन महिला वायरोलॉजिस्ट ने दी हैं दुनिया को कई जानलेवा बीमारी से बचाने वाली वैक्सीन

कोरोना वायरस के उपचार के लिए 40 से ज्यादा देशों में 100 से भी ज्यादा वैज्ञानिक और शोधकर्ता टीका और दवा विकसित करने में जुटे हुए हैं।

By: Mohmad Imran

Updated: 18 Apr 2020, 03:54 PM IST

कोरोना वायरस के बारे में अधिक से अधिक जानकारी जुटाने और वायरस के टीके की खोज में भारत की भी महिला वायरोलॉजिस्ट दिन-रात जुटी हुई हैं। टीके की खोज के अलावा ये चीचीईकिट, मेडिकल उपकरण और पोर्टेबल वेंटिलेटर जैसे अन्य जरूरी उपकरणों के निर्माण में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। हाल ही पुणे स्थित मायलैब डिस्कवरी सॉल्यूशंस में अनुसंधान और विकास प्रमुख के पद पर कार्यरत मीनल दक्ष भोंसले ने देश का पहला कोरोना किट बनाया जिससे परीक्षण की लागत बहुत कम हो गई। उनकी बनाई किट दो से ढाई घंटे में परीक्षण परिणम बता देती है जबकि इससे पहले ४ से ५ घंटे का समय लगता था। ये सभी भारतीय विषाणुविज्ञानी पूरे समर्पण और कड़ी मेहनत से टीका बनाने में जुटी हुई हैं। आइए जानते हैं ऐसी ही कुछ खास भारतीय हस्तियों के बारे में-

 मीनल दक्ष भोंसले

गगनदीप कंग- vaccine mother of india
इन्हें भारत की 'वैक्सीन गॉडमदर' भी कहा जाता है। वह बच्चों में वायरल संक्रमणों की अग्रणी शोधकर्ता हैं और उन्होंने 1990 के दशक से भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य और डायरिया जैसे रोगों पर काम किया है। इतना ही नहीं 358 सालों में पहली बार रॉयल सोसायटी ऑफ लंदन की फेलो के रूप में चुनी जाने वाली वे पहली भारतीय महिला भी हैं। भारतीय मूल की वैज्ञानिक गगनदीप कंग रॉयल सोसायटी में शामिल होने वाली पहली महिला बन गई हैं. वह प्रतिष्ठित फेलो रॉयल सोसायटी (FRS) में 358 वर्षों के इतिहास में चयनित होने वाली पहली भारतीय महिला वैज्ञानिक हैं.
हरियाणा के फरीदाबाद की गगनदीप कंग ने अपनी मेहनत से इस सूची में अपना स्थान बनाया है. उन्होंने रोटावायरस टीके के अनुसंधान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है और डायरिया के लिए वैक्सीन विकसित करने वाली टीम की भी वे प्रमुख वैज्ञानिक थीं। उनके नाम पर 300 से अधिक शोध पत्र हैं।

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आशा माथुर-जेई वायरस की खोजकर्ता
सरस्वती मेडिकल एंड डेंटल कॉलेज, लखनऊ की प्रोफेसर आशा माथुर ने जापानी इंसेफेलाइटिस या जेई वायरस की दृढ़ता का अध्ययन किया और कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने लेकर आईं। गर्भावस्था में वायरस भ्रूण को नुकसान पहुचा सकते हैं यह तथ्य माथुर ने ही खोजा था। उनकी इस खोज के कारण ही मानव शरीर में वायरस की सक्रियता को समझाने के लिए नए विज्ञान मॉडल विकसित किया गया था।

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एच.एस. सावित्री-जीनोम अनुक्रम निर्धारित किया
आइआइएससी, बैंगलोर की आणविक संयंत्र विषाणु विज्ञान, एंजाइमोलॉजी और प्रोटीन रसायन विज्ञान की प्रोफेसर एच.एस.सावित्री ने पति एमआरएन मूर्ति की मदद से वायरस के पूर्ण जीनोम अनुक्रम को निर्धारित करने का काम किया है और वायरस पर संरचनात्मक कार्य किया है। वह प्रायोगिक विज्ञान की विशेषज्ञ हैं।

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विद्या अरंकल-जानलेवा वायरसों के बना रही टीके
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी की पूर्व निदेशक एवं प्रभारी वैज्ञानिक विद्या अरंकल पुणे में अग्रहार संस्थान की प्रमुख हैं। वह हेपेटाइटिस समूह के वायरस पर शोध कर रही टीम का नेतृत्व भी कर रही हैं। इसके अलावा वे कई उभरते वायरस जैसे कि चंडीपुरा, चिकनगुनिया, निपाह, महामारी स्वाइन इन्फ्लूएंजा और एच 5 एन 1 का टीका भी विकसित करने में जुटी हुई हैं। वे टीके के विकास और मूल्यांकन, इम्यूनोएसेस और पीसीआर-आधारित निदान के विकास पर शोधकार्य कर रही हैं।

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इनके अलावा बीते माह कोरोना से संक्रमित होने पर इलाज के दौरान दम तोड़ देने वाली विश््रव प्रसिद्ध वायरोलॉजिस्ट गीता रामजी भी कोरोना टीके पर काम कर रही थीं। वहीं कई बड़े शोधकार्यांे और टीके केविकास का हिस्सा रहीं भारतीय मूल की प्रोफेसर पॉली रॉय भी इस सूची में शामिल हैं।

पॉली रॉय-वायरस के सेल-टू-सेल ट्रांसमिशन को समझने में महत्वपूर्ण योगदान

भारतीय मूल की डॉक्टर पॉली रॉय एक संक्रामक रोग विशेषज्ञ और लंदन स्थित पैथोजीन आणविक जीवविज्ञान विभाग में लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन में वायरोलॉजी की प्रोफेसर हैं। वे अभी दुनिया भर के शोध संस्थानों की ओर से चलाए जा रहे शोधों और विभिन्न आरएनए वायरस पर काम कर रही हैं। बीते तीन सालों से उनकेकाम का मुख्य विषय विशेष रूप से ब्लूटेन्गू वायरस या बीटीवी है जो एक जटिल स्तर का वायरस है। रॉय ने बुनियादी आणविक और कोशिका जीव विज्ञान, उनकी परमाणु संरचना, वायरस प्रविष्टि के तंत्र, जीनोम संश्लेषण, आरएनए पैकेजिंग, कैप्सिड असेंबली, इनग्रेड और इन वायरस के सेल-टू-सेल ट्रांसमिशन को समझने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने प्रभावकारी वीएलपी वैक्सीन, बीटीवी और अफ्रीकी हॉर्स बीमारी वायरस या एएचएसवी और वैकल्पिक चिकित्सीय संभावनाओं के अलावा वैकल्पिक एंट्री रेप्लेंट रिप्लेसमेंट एबर्टिव टीके या ईसीआरए भी विकसित किया है। यही वजह है कि रॉय के काम को दुनिया भर में मान्यता और कई पुरस्कार मिले हैं। वायरस अनुसंधान में सेवाएं देने के लिए ब्रिटिश साम्राज्य के आदेश के अधिकारीय चिकित्सा विज्ञान अकादमी की फैलोशिप और भारतीय विज्ञान कांग्रेस के महामहिम राष्ट्रपति का स्वर्ण पदक भी उन्हें मिल चुका है।

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Mohmad Imran Desk/Reporting
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