पहाड़ों पर बरसते कहर को रोकेगा सिर्फ एक पत्थर, वैज्ञानिकों ने निकाला ऐसा अनोखा तरीका

  • गुफा के अंदर चूना-पत्थर माप पाएंगे जलवायु को
  • मानसून के पैटर्न, सूखे और बाढ़ का चल सकेगा पता
  • मेघालय की पहाड़ों में ढूढ़ा बरसते कहर का हल

By: Vishal Upadhayay

Published: 01 Apr 2019, 06:08 PM IST

नई दिल्ली : अचानक आई आपदाओं के कारण गांव और शहरों को भारी नुकसान झेलना पड़ता है,जिसके चलते जानमाल की हानि होती है। इससे बचने के लिए वैज्ञानिक नई-नई खोज कर रहे हैं। जिसके चलते होने वाले नुकसान से बचा जा सके। इसके लिए वैज्ञानिकों को भारत की गुफाओं में चूना पत्थर का ढेर मिला है। जिससे प्राकृतिक आपदा के बारे में पता लगाया जा सकेगा। एेसा रिसर्च के दौरान बताया गया है। कहा जाता है कि अब ऐसी आने वाली आकस्मात आपदा के संकेत इन पहाड़ो से मिल पाएगें। इस वजह से आने वाली बाढ़ जैसी समस्या से बचा जा सके।

आपकों बता दें कि मेघालय की एक गुफा के अंदर चूना-पत्थर के ढेर ने जलवायु परिवर्तन के बारे में पता लगाया जा सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत में गुफा की छत के टपकाव से फर्श पर जमा हुए चूना-पत्थर के स्तंभ की तलछटी (स्टलैग्माइट) से देश में मानसून के पैटर्न, सूखे और बाढ़ के बारे में बेहतर अनुमान लगाया जा सकता हैं।

अमेरिका में सिथित वंडेरबिल्ट यूनिवर्सिटी के अनुसंधानकर्ताओं ने पिछले 50 साल में मेघालय में माव्मलु गुफा के भीतर टपकने वाले चूना-पत्थर (स्ट्लैग्माइट) के बढ़ते ढेर का अध्ययन किया गया है।

दरअसल, मेघालय को दुनिया में सबसे ज्यादा वर्षा वाला क्षेत्र कहा जाता है ‘साइंटिफिक रिपोर्ट’ में प्रकाशित अध्ययन में पूर्वोत्तर भारत में सर्दी की बारिश और प्रशांत महासागर में जलवायु की स्थिति में असमान्य संबंध पाया गया। माव्मलु गुफा और आस-पास के इलाके में चूना-पत्थर का ढेर से होने वाली बार बार घटना, पिछले कुछ हजार वर्षों में भारत में सूखे का संकेत देता है।

भारत सहित मानसूनी क्षेत्रों में चूना-पत्थर का यह स्तंभ वैश्विक पर्यावरण तंत्र को समझने में मददगार हो सकता है और यह पर्यावरण में होने वाले परिवर्तन को भी बताता है।

वंडेरबिल्ट यूनिवर्सिटी में पीएचडी छात्र एली रॉने ने बताया कि गुफा के भीतर हवा और जल के प्रवाह से शुष्क मौसम में टपकने वाले चूने के ढेर को बढ़ने में मदद मिलती है।इससे अंदर की परिस्थिति पर गहरा असर पड़ता है।

Vishal Upadhayay
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