
सीकर.
शहर के लोगों को राहत दिलाने के लिए बनाई जा गई नंदीशाला के सफल संचालन में वन विभाग के नियमों का ब्रेक लग सकता है। शहरी सरकार की ओर से नंदीशाला खोलने की कवायद भी की गई लेकिन बाद में संचालन से हाथ खींचने के कारण नंदीशाला में चारा नहीं मिला तो आवारा पशुओं को खोल दिया गया। नतीजन शहर में चहुंओर आवारा पशुओं का आंतक सताने लगा है। इसकी वजह सांडों के लिए चारा उगाने के लिए नंदीशाला के पास नानी बीड़ स्थित 35 बीघा हैक्टेयर वन विभाग की भूमि के डायवर्जन को लेकर होगी। इस भूमि के डायवर्जन को लेकर संचालकों को तीन करोड़ रुपए से अधिक वन विभाग में जमा कराने होंगे। डायवर्जन के बाद भी भूमि का उपयोग केवल मवेशी चारा उगाने व पेड पौधे के लिए ही हो सकता है। नानी बीड़ की 35 हेक्टेयर भूमि के डायवर्जन के पेटे बरसों पहले वन विभाग ने गोशाला को तीन करोड़ रुपए से अधिक जमा कराने के निर्देश दिए थे लेकिन राशि नही मिलने के कारण डायवर्जन प्रक्रिया शुरू तक नहीं हो सकी है।
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वन विभाग के नाम रहेगी भूमि
इसके अलावा परेशानी यह भी है कि तीन करोड़ रुपए से अधिक की इस भूमि के लीगल स्टेट्स को लेकर रहेगी। यह भूमि वन विभाग के ही नाम रहेगी। उच्चतम न्यायालय की गाइडलाइन के अनुसार डायवर्जन होने पर भूमि का उपयोग केवल मवेशी चराने व पेड़ पौधे लगाने में ही हो सकता है। ऐसे में पूर्व में भी डायवर्जन के प्रस्ताव कागजों में अटक गए थे।
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देना होगा शुल्क
नानी बीड़ की 35 हेक्टेयर भूमि के लिए वन विभाग को वन क्षेत्र में 35 हेक्टेयर भूमि देनी होगी। इसके अलावा शुल्क के रूप में नानी बीड़ की भूमि की वर्तमान कीमत, 1.45 लाख रुपए प्रति हेक्टेयर पौधे लगाने की कीमत भी अतिरिक्त देनी होगी। बरसों पहले इस भूमि के प्रस्ताव की राशि तीन करोड़ 20 लाख रुपए आंकी गई थी। नानी बीड़ की भूमि के आंवटन को लेकर राजस्व विभाग को प्रस्ताव दिया गया है। वन विभाग में निर्धारित शुल्क जमा करवा करवाने पर डायवर्जन जल्द हो जाएगा। डायवर्जन होने से लोगों को आवारा पशुओं से राहत मिलेगी। - राजेन्द्र हुड्डा, उपवन सरंक्षक सीकर
Published on:
06 Aug 2017 11:25 am
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