हालांकि सुबह हवा की कम रफ्तार से योद्धा कुछ बैचेन रहे, लेकिन दिन चढऩे के साथ ही हवा ने पतंगबाजों का खूब साथ दिया। दिनभर वो काटा-वो मारा और म्यूजिक के बीच पेच काटने के साथ पतंगबाजों का हौसला भी परवान पर रहा। सुबह की चाय और दोपहर का खाना भी छतों पर ही हुआ। आकाश में ही नहीं बल्कि गली, चौराहे, सडक़ों, तारों, खंबों और पेड़ों तक रंगबिरंगी पतंगें लबालब भरी रही। तेज म्यूजिक के साथ दिनभर पतंगबाज दावपेच आजमाते रहे। दिन चढ़ते तक तो सारा शहर ही सब काम-धंधे छोडकर छतों पर आ जुटा।