11 अगस्त 2026,

मंगलवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

1973 की बाढ़ में डूब गया था राजस्थान का आनंदेश्वर मंदिर, फिर भी सुरक्षित मिलीं मूर्तियां; खुद बज उठी थीं मंदिर की घंटियां

राजस्थान के आबूरोड में पश्चिम बनास नदी के तट पर स्थित प्राचीन आनंदेश्वर महादेव मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। मंदिर से जुड़ा साल 1973 की भीषण बाढ़ का चमत्कार आज भी चर्चित है। पुजारी अशोक रावल के अनुसार, 1973 में बाढ़ का पानी मंदिर में भर गया था, जिससे मूर्तियां जलमग्न हो गईं थीं। अगले दिन पूजा के समय पानी के बहाव और हिलोरों से मंदिर की घंटियां खुद-ब-खुद बजने लगीं।
2 min read
Google source verification
abu road anandeshwar temple

आबूरोड स्थित आनंदेश्वर महादेव मंदिर (पत्रिका फोटो)

Sirohi Abu Road Anandeshwar Mahadev Temple: आबूरोड शहर के बीच से गुजर रही पश्चिम बनास नदी के तट पर स्थित प्राचीन आनंदेश्वर महादेव मंदिर आज भी श्रद्धा का प्रमुख केंद्र है। मंदिर से जुड़ी कई मान्यताएं और परंपराएं वर्षों से चली आ रही हैं। इनमें साल 1973 की भीषण बाढ़ की घटना आज भी भक्तों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है।

मंदिर के पुजारी अशोक रावल के अनुसार, साल 1973 में आई बाढ़ का पानी मंदिर परिसर में भर गया था। रात में पानी मंदिर के अंदर पहुंचने से भगवान भोलेनाथ सहित अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां और पूजन सामग्री डूब गई थी। पानी का बहाव तेज होने पर वे परिवार सहित मंदिर के अंदर बने आवास की छत पर चले गए थे।

अगली सुबह पूजा का समय हुआ, लेकिन मंदिर में पानी भरा होने से पूजा संभव नहीं थी। इसी दौरान करीब पांच फीट ऊंचाई पर लटकी मंदिर की घंटियां बाढ़ के पानी की हिलोरों के साथ अपने आप बजने लगीं। बाद में जलस्तर कम हुआ। पानी उतरने पर मंदिर में जाकर देखा तो मूर्तियां और पूजन सामग्री सुरक्षित मिली। श्रद्धालु आज भी इस घटना को भोलेनाथ का चमत्कार मानते हैं।

साल 1934 में हुआ था मंदिर का जीर्णोद्धार

अशोक रावल ने बताया कि उनके माता-पिता के अनुसार, साल 1934 में पंजाब निवासी स्वामी रामतीर्थ ने मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। पेशे से वकील स्वामी रामतीर्थ जीर्णोद्धार के बाद यहीं रुक गए। उनकी बहन भी उनके साथ रहती थीं। दोनों मंदिर में पूजा-अर्चना और देखरेख करते थे। बाद में उनकी बहन का निधन हो गया। साल 1978 में स्वामी रामतीर्थ भी देवलोकगमन कर गए।

खत्म हुई झूले के परंपरा

रावल ने बताया कि मंदिर परिसर में पहले एक विशाल पीपल का पेड़ था। श्रावण मास में इस पेड़ पर रस्सी का झूला बांधा जाता था, जिस पर महिलाएं झूला झूलती थीं। करीब 30 वर्ष पहले पेड़ गिर गया। बाद में उसी स्थान पर नया पीपल का पौधा लगाया, जो अब बड़ा हो चुका है। लेकिन, श्रावण मास में महिलाओं के झूला झूलने की पुरानी परंपरा दोबारा शुरू नहीं हो सकी है।

365 दिन महादेव का शृंगार, सालभर उमड़ते श्रद्धालु

मंदिर के तीसरी पीढ़ी के पुजारी अशोक रावल ने बताया कि मंदिर में भगवान भोलेनाथ का वर्षभर प्रतिदिन शृंगार किया जाता है। श्रावण मास और जन्माष्टमी पर विशेष शृंगार के साथ प्रसादी वितरण किया जाता है। मंदिर परिसर में हनुमानजी, राधा-कृष्ण और लक्ष्मी माता के मंदिर भी हैं। यहां पूरे साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।