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पड़ोसी हरियाणा की आफत बनती है राजस्थान के इन दो जिलों के लिए वरदान

घग्घर बाढ़ नियंत्रण विभाग के अनुसार घग्घर नदी में पांच हजार क्यूसेक पानी आने पर ही इन झीलों में पानी छोड़ा जाता है। पांच हजार क्यूसेक पानी में से 3 हजार क्यूसेक पानी नदी बहाव में तथा 2 हजार क्यूसेक पानी झीलों में छोड़ा जाता है।

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फोटो: पत्रिका

सुनने में भले ही अजीब लगे लेकिन यह सत्य है। हनुमानगढ़ व श्रीगंगानगर जिलों में स्थित घग्घर की अठारह प्राकृतिक झीलों व उनके पारिस्थितिकी तंत्र अर्थात इको सिस्टम का अस्तित्व हरियाणा में बाढ़ जैसी आपदा निर्भर है। घग्घर नदी के बहाव क्षेत्र में बनी प्राकृतिक झीलों (डिप्रेशनों) में पानी तभी आता है, जब हरियाणा में बाढ़ जैसे हालात बन जाते हैं। इसका मुख्य कारण है हरियाणा के सिरसा जिले में बना ओटू डैम, जिसके निर्माण के बाद पानी की कमी के चलते धीरे-धीरे यह झीले सूखती चली गई।

वर्तमान में केवल एक ही झील में सेम नाले का पानी मौजूद है। हालात यह है कि कई वर्षों के दौरान हिमाचल सहित हरियाणा में भारी बरसात होने पर ही घग्घर साइफन में पानी छोड़ा जाता है। दशकों तक जल से सराबोर रही घग्घर की इन 18 झीलों का अपना इको सिस्टम विकसित हो चुका है। ऐसे में झीलों के सूखने का सीधा कुप्रभाव इन झीलों के इको सिस्टम पर फलने फूलने वाले वन्यजीवों और वनस्पति पर भी पड़ रहा है।

बाढ़ से प्राकृतिक सुरक्षा कवच हैं झीलें

मृत नदी के नाम से विख्यात घग्घर नदी हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर जिलों के लिए यह नदी जीवनदायिनी से कम नहीं हैं। हनुमानगढ़ से राजस्थान में प्रवेश करने वाली बरसाती घग्घर नदी के उफान को धीमा कर बाढ़ जैसी आपदा से बचाने के लिए सूरतगढ़ क्षेत्र की पन्द्रह एवं हनुमानगढ़ में तीन झीलें भी प्रकृति का अनमोल वरदान हैं।

यह सभी झीलें एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। जिनमे प्राकृतिक सीमा तक पानी भरने के बाद अपने आप ही एक से दूसरी झील में पानी पहुंचता है। दशकों तक वर्षभर पानी से सराबोर रहने वाली यह झीलें क्षेत्रीय इको सिस्टम की रीढ़ रही। लेकिन हरियाणा में ओटू डेम के निर्माण के बाद इन डिप्रेशनों में पूर्व की भांति पानी नहीं पहुंचता है। कभी यह झीलें मत्स्य पालन का बड़ा केन्द्र थी।

यहां पर स्थित हैं झीलें

हनुमानगढ़ में खेदासरी, मानकथेड़ी, बड़ोपल तथा सूरतगढ़ तहसील में सरदारपुरा खर्था, ठेठार, ताखरांवाली, कानौर, भोजेवाला, रंगमहल, किशनपुरा, टिलांवाली, राजपुरा पीपेरन, ढाढियांवाली, अमरपुरा जाटान, सूरतगढ़ शहर, नांगलिया, सरदारपुरा लाडाना व पदमपुरा के समीप टीलों के बीच प्राकृतिक रूप से ही गहरे स्थान हैं। जो कि घग्घर की झीलों का निर्माण करते हैं। झील रूपी ये स्थल आपस में जुड़े हैं और इनकी भराव क्षमता 7 लाख 35 हजार 799 एकड़ फीट है।

बिन पानी सब सून

घग्घर बाढ़ नियंत्रण विभाग के अनुसार घग्घर नदी में पांच हजार क्यूसेक पानी आने पर ही इन झीलों में पानी छोड़ा जाता है। पांच हजार क्यूसेक पानी में से 3 हजार क्यूसेक पानी नदी बहाव में तथा 2 हजार क्यूसेक पानी झीलों में छोड़ा जाता है। पानी की आवक अधिक होने पर प्राकृतिक रूप से एक झील भरने के बाद पानी दूसरी झील तक पहुंचता है।

वर्ष 2023 में हरियाणा में बाढ़ जैसे हालात बनने पर घग्घर बहाव क्षेत्र में दस हजार क्यूसेक से अधिक पानी आया था, जिससे एक दशक बाद इन झीलों में पानी की आवक हुई थी। लेकिन पिछले वर्ष यहां एक बूंद पानी नहीं पहुंचा। वर्तमान में घग्घर नाली बैड में केवल 3 हजार क्यूसेक पानी ही चल रहा है, जिससे धान उत्पादकों के माथे पर चिंता की लकीरें हैं।

पानी की कम आवक के कारण घग्घर की प्राकृतिक झीलों के सूखने से जहां राईस बेल्ट प्रभावित हो रहा है, वहीं यहां का इको सिस्टम भी गड़बड़ा चुका है। पानी के अभाव में जहां वन्यजीव अन्यत्र पलायन कर चुके हैं तो, जलचर और जलीय वनस्पतियां तो लगभग खत्म हो चुकी हैं।

अतिवृष्टि पर छोड़ा जाता है घग्घर में पानी

घग्घर बाढ़ नियंत्रण विभाग के सहायक अभियंता हनुमानगढ़ संदीप कुमार ने बताया कि इस समय घग्घर नाली बैड में 3 हजार क्यूसेक पानी चल रहा है, फिलहाल कम बारिश को देखते हुए पानी के बढ़ने की संभावना कम है। हरियाणा में अधिक बरसात या बाढ़ जैसी आपदा की स्थिति होने पर ही घग्घर नदी में पानी छोड़ा जाता है। वहीं घग्घर साइफन में पानी की मात्रा पांच हजार क्यूसेक होने पर झीलों में पानी छोड़ा जाता है। वर्तमान में पानी की मात्रा बेहद कम चल रही है, इसलिए झीलों में पानी नहीं पहुंच रहा है।