
नेताजी की मौत की खबर 5 दिन तक क्यों छिपाई गई? फोटो सोर्स- AI
Subhash Chandra Bose plane crash: भारत की आजादी में अहम भूमिका निभाने वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आज 81वीं पुण्यतिथि है। उनकी मौत को लेकर कई तरह के सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में इतने सालों बाद भी ये एक रहस्य की तरह है अगर नेताजी सुभाष चंद्र बोस का निधन 18 अगस्त 1945 को प्लेन एक्सीडेंट में हुआ, तो फिर पूरी दुनिया को इस बारे में बताने के लिए तत्कालीन जापान की सरकार ने पांच दिनों का समय क्यों लिया।
अगर तारीखों पर जाएं और जापान सरकार द्वारा जारी रिकॉर्ड की बात करें तो नेताजी सुभाष चंद्र बोस का विमान 18 अगस्त को ताइपे के तायहोकु एयरपोर्ट पर दुर्घटनाग्रस्त हुआ, कुछ ही घंटो बाद अस्पताल में नेताजी का निधन हो गया। बड़ा सवाल है कि नेताजी के निधन की खबर को जापान ने पांच दिनों तक क्यों छिपाया, इन पांच दिनों में जापान में सुभाष चंद्र बोस को लेकर क्या-क्या होता रहा।
ऐसे ही सवालों को उठाती है वरिष्ठ पत्रकार संजय श्रीवास्तव की नेताजी पर आधारित किताब ‘नेताजी की रहस्यमय मृत्यु की शोधपूर्ण अंतर्कथा सुभाष बोस की अज्ञात यात्रा’। किताब के जरिए संजय श्रीवास्तव कहते हैं कि जब 23 अगस्त को जापान की सरकारी एजेंसी डोमेई ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के निधन की खबर जारी की तो इस पर किसी ने भरोसा नहीं किया। भारत के अखबारों में यह खबर लंदन डेटलाइन से छपी, कलकत्ता में तब छपने वाले अंग्रेजी अखबार ‘हिंदुस्तान स्टैंडर्ड’ ने 24 अगस्त, 1945 के अंक में सुर्खियों में यह खबर प्रकाशित की। इस खबर में कहा गया था कि एक जापानी न्यूज एजेंसी ने सुभाष चंद्र बोस के निधन की खबर की घोषणा की है। खबर के दूसरे पैरे में कहा गया था कि एक विभान दुर्घटना में नेताजी को गंभीर चोटे आईं और फिर अस्पताल में उनका निधन हो गया
खबर के अनुसार नेताजी का निधन तायहोकु में रात आठ बजे बताया गया। इस खबर को भारत के सभी अखबारों ने सुर्खियों में प्रकाशित किया, पर यह सवाल आज भी है कि जब नेताजी का निधन 18 अगस्त को रात में तायहोकु में होना ही बताया गया तो अगले पांच दिनों में क्या होता रहा, क्यों जापानी सरकार ने इस खबर की कानों कान भनक भी नहीं लगने दी। आखिरकार 23 अगस्त को जापानी न्यूज एजेंसी ने इसे प्रसारित किया। नेताजी के निधन की खबर में इतनी देरी पर हर किसी ने हैरानी व्यक्त की, क्योंकि ऐसा आमतौर पर होता नहीं है।
चलिए रिकॉर्ड्स के अनुसार देखते हैं कि 18 अगस्त से 23 अगस्त तक क्या होता रहा, जब तक कि नेताजी के निधन की खबर प्रसारित नहीं कर दी गई। इसे इतना गुप्त क्यों रखा गया?
18 अगस्त, 1945
नेताजी का विमान 18 अगस्त की सुबह पांच बजे सैली फारमोसा से लिए रवाना हुआ। दोपहर तक तायहोकू (ताइपे) एयरपोर्ट पहुंचा। वहां यात्रियों ने हल्का-फुल्का लंच लिया। बताया जाता है जैसे ही ये विमान तायहोकू रनवे से थोड़ा ही ऊपर उठा, इसने आग पकड़ ली और यह नीचे आने लगा। नीचे गिरते ही वह दो टुकड़ों में टूट गया। शाहनवाज-रिपोर्ट भी कहती है कि विमान ज्यो हीं उड़ा, मुश्किल से 30-40 मीटर ऊपर जाते ही वह नियंत्रण खो बैठा। 50 मीटर की ऊंचाई से विमान तीन सेकेंड में जमीन पर आ गिरा।
बोस पेट्रोल टैंक के पास ही बैठे थे। बोस को स्थानीय सैन्य-अस्पताल ले जाया गया। जब तक वे वहां पहुंचे तब तक तीन बज चुके थे। यह थर्ड डिग्री बर्न के बाद उनकी हालत गंभीर थी। फिर उनकी हालत बिगड़ने लगी। शाम सात बजे वह अचेत हो गए। फिर कोमा में चले गए। उनका निधन 18 अगस्त की रात आठ बजे के आसपास बताया गया।
19 अगस्त, 1945
सुभाष के निकट सहयोगी कर्नल हबीबुर्रहमान उस समय उनके साथ थे। रहमान ने शाहनवाज-आयोग को बताया कि निधन के बाद स्थानीय स्तर पर ताबूत की व्यवस्था की गई। टोक्यो यह खबर भेजी गई कि नेताजी का निधन हो गया, वहां से ये कहा गया कि एक विमान नेताजी के शव को लेने वहां आएगा। लेकिन इस खबर को गुप्त रखा गया।19 अगस्त को ही जापान के इम्पीरियल हेड क्वार्टर से एक टेलीग्राम अस्पताल आया, जिसमें कहा गया कि उनकी बॉडी को विमान से टोक्यो ले जाया जाएगा। शव को कॉफिन में रख दिया गया।
20 अगस्त, 1945
कर्नल हबीब ने शाहनवाज-आयोग को बताया था कि वे चाहते थे सुभाष के शव को टोक्यो ले जाया जाए ताकि उनकी मौत को लेकर कोई संशय नहीं रहे। सुभाष के पार्थिव शरीर को 20 अगस्त को तायहोकू एयरपोर्ट पर ले जाया गया। शव एयरपोर्ट पर रखा रहा। कुछ घंटे बाद कहा गया कि इसे कुछ अज्ञात कारणों से टोक्यो नहीं ले जाया जा सकता। अगर रिपोर्ट्स और शाहनवाज-कमीशन के सामने आई गवाहियों को मानें तो नेताजी का शव ताबूत में 20 अगस्त को कई घंटों तक तायहोकू एयरपोर्ट पर रखा रहा।
कर्नल हबीब ने आयोग को बताया कि विमान शव को इसलिए नहीं ले जा सका, क्योंकि ताबूत विमान में नहीं आ पा रहा था। फिर टोक्यो से निर्देश आया कि इस शव का अंतिम-संस्कार स्थानीय स्तर पर कर दिया जाए। 20 अगस्त को ही मृत्यु-प्रमाणपत्र बनाया, जिसमें मृत्यु का कारण बुरी तरह से जलना और सदमा बताया गया। शाम तक तायहोकू में अस्पताल से सटे मंदिर में अंतिम-संस्कार कर दिया गया। कर्नल ने कहा कि जापानी अधिकारी नहीं चाहते थे कि उस समय किसी को भी बताया जाए कि मृतक कौन था।
21 अगस्त, 1945
जापानी सेना के मेजर नागामोतो ने शाहनवाज जांच-आयोग से कहा, ‘21 अगस्त की सुबह मैं आठ बजे अस्पताल पहुंचा ताकि भारतीय सैन्य-अधिकारी को साथ ले सकूं। शवदाह-गृह में पहुंचने पर देखा कि शव पूरी तरह जल चुका था। बौद्ध-परंपरा के अनुसार मैंने चॉप स्टिक से गले की हड्डी उठाई और बॉक्स में डाल ली। फिर शरीर के हर हिस्से की हड्डी इकट्ठा की। भारतीय सैन्य-अधिकारी भी मेरे साथ वही करते जा रहे थे। जब लकड़ी का यह छोटा-सा बॉक्स भर गया तो मैंने इसे बंद कर सफेद कपड़े से कवर कर दिया। हम इसके बाद कार से होंगाजी मंदिर गए, जहां उस दिन खास सेरेमनी हुई।‘ आयोग के सामने कर्नल हबीबुर्रहमान ने भी यही बात कही।
22 अगस्त, 1945
नेताजी के निधन को लेकर टोक्यो में उच्च सैन्य-अधिकारियों और सरकार के बीच मीटिंग हुई, जिसमें यह विचार किया गया कि नेताजी के निधन की खबर किस तरह रिलीज की जाए। लेकिन वे यह चाहते थे कि यह खबर आजाद हिंद फौज के किसी अधिकारी द्वारा ही बताई जाए। यह भी बताया जाता है कि जापानी असमंजस में थे कि इस खबर को अभी रिलीज किया जाए या नहीं। यह भी असमंजस था कि दुनिया इस पर विश्वास करेगी या नहीं। कई दौर की मीटिंग और असमंजस के बाद आखिरकार 23 अगस्त, 1945 को जापान की न्यूज एजेंसी डोमेई (अब क्योडो) ने उनके निधन की खबर प्रसारित की।
23 अगस्त, 1945
आखिरकार नेताजी के निधन की खबर जापानी न्यूज एजेंसी डोमेई ने जारी की, लेकिन जब यह खबर जारी हुई तो इस पर किसी ने विश्वास नहीं किया। ब्रिटिश-सरकार और उसकी खुफिया एजेंसी का मानना था कि जापान-सरकार ने बोस को चुपचाप निकल जाने का मौका दिया है। फिर यह खबर प्रसारित कराई। नेताजी के निधन के साथ ही जनरल सिद्दी के निधन की खबर की भी घोषणा की गई। हालांकि यह अब तक रहस्य है कि जापान पांच दिनों तक नेताजी के निधन को लेकर कौन-सी मंत्रणा में लगा रहा था।
पहला सवाल: अस्पताल के रजिस्टर में कहीं नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम दर्ज क्यों नहीं था, बल्कि इस रजिस्टर में नेताजी के साथ मारे गए जनरल सिद्दी का नाम भी दर्ज नहीं था।
दूसरा सवाल: अगर नेताजी का निधन 18 अगस्त को हो गया था तो जापान ने इसकी पुष्टि के लिए क्यों अपना कोई उच्च अधिकारी तायहोकू नहीं भेजा, जबकि बोस को जापान बहुत ऊंचा दर्जा देता था और मानता था कि वह निर्वासित भारत-सरकार के मुखिया हैं। जब तक वे जिंदा रहे, उन्हें जापान की ओर से इसी के अनुरूप प्रोटोकॉल मिलता रहा।
तीसरा सवाल: आखिर जापान ने सुभाष के निधन की खबर पांच दिन क्यों रोके रखी। हालांकि जिस तरह सुभाष के निधन की बात सामने आई, उस पर खुद जापान में मौजूद उनके तमाम करीबियों तक ने विश्वास नहीं किया था।
चौथा सवाल: सुभाष के निधन की जांच करने वाले जस्टिस मनोज मुखर्जी-आयोग ने क्यों कहा कि जिस एयरपोर्ट पर सुभाष चंद्र बोस के विमान के क्रैश की बात जापान द्वारा कही गई, वहां तो सात अगस्त से लेकर अक्टूबर तक कोई भी विमान दुर्घटनाग्रस्त नहीं हुआ था। मुखर्जी-कमीशन ने यह भी पाया कि अंतिम-संस्कार के रजिस्टर पर 17 से 25 अगस्त तक सुभाष चंद्र बोस और लेफ्टिनेंट जनरल सिदेई का नाम नहीं था। न ही उसमें उन पायलटों के नाम दर्ज थे, जिनके बारे में कहा गया था कि वह भी उसी क्रैश में मारे गए। अगले कुछ दिनों में जापान या ताइवान के किसी अखबार में प्लेन-क्रैश की खबर नहीं प्रकाशित हुई। आयोग इस निष्कर्ष पर भी पहुंचा कि टोक्यो के रेंकोजी मंदिर में रखी हुई अस्थियां नेताजी की नहीं, बल्कि जापानी सैनिक इचिरो ओकुरा की हैं, जिसकी मौत हृदय आघात से हुई थी।
पांचवां सवाल: अगर वाकई सुभाष विमान-दुर्घटना में मारे गए थे तो उनके निधन को गुप्त रखने से जापान का क्या भला हो सकता था। जापान द्वारा नेताजी के निधन पर ऐसा रुख और खबर को अनावश्यक तौर पर दबाए रखना अगर रहस्यमय है तो शक भी पैदा करता है।
Updated on:
18 Aug 2026 05:02 pm
Published on:
18 Aug 2026 04:09 pm
