
दिव्येश सोंदरवा.सूरत.
फीस को लेकर अभिभावकों के साथ लम्बे समय से चल रही उठापटक और तनातनी के बीच अब निजी स्कूलों ने अपने फीस ढांचे को तर्कसंगत साबित करने की कवायद शुरू कर दी है। इसके लिए कई स्कूलों ने डॉक्यूमेंट्री फिल्म तैयार की है, जिसमें निजी और सरकारी स्कूलों की सुविधाओं का अंतर बताकर तगड़़ी फीस को वाजिब बताया जा रहा है। इन सुविधाओं के अंतर से बच्चों के भविष्य पर क्या असर पड़ता है, फिल्म में यह भी बताया गया है।
शहर की निजी स्कूलों की फीस को लेकर विवाद जारी है। अभिभावक स्कूल संचालकों पर फीस कम करने का दबाव बना रहे हैं तो स्कूल मनमानी फीस वसूलने पर आमादा हैं। दोनों के बीच का यह विवाद वीडियो 'वॉरÓ तक पहले ही पहुंच चुका है। दोनों पक्षों की ओर से एक-दूसरे के खिलाफ सोशल साइट पर वीडियो वायरल किए जा चुके हैं। निजी स्कूलों ने अपने फीस ढांचे के समर्थन में नया रास्ता खोजा है। अभिभावकों से फीस वसूलने और उनके आक्रोश को शांत करने के लिए उन्होंने डॉक्यूमेंट्री बनाई है।
निजी और सरकारी स्कूलों की तुलना
डॉक्यूमेंट्री की शुरुआत निजी और सरकारी स्कूलों की तुलना से होती है। कम फीस वाले और नि:शुल्क सरकारी स्कूलों में विद्यार्थी किस तरह पढ़ते हैं, उन्हें किस तरह की सुविधाएं मिलती हैं, यह बताने के बाद इसका जिक्र बढ़-चढ़कर किया गया है कि निजी स्कूल जो फीस वसूलते हैं, उसके एवज में किस तरह की पढ़ाई करवाई जाती है और बच्चों को क्या-क्या सुविधाएं दी जाती हैं।
निजी स्कूल में रसोईघर कैसा है
डॉक्यूमेंट्री में बताया गया है कि निजी स्कूल में रसोईघर कैसा है, बच्चों को प्रोटीन और हाइजेनिक खाना दिया जाता है, मेस में डाइनिंग टेबल पर बैठाकर खिलाया जाता है। आगेे सरकारी और कम फीस वाले स्कूलों की रसोईघर की हालत दिखाई गई है। जमीन पर बैठकर खाने का वीडियो भी दिखाया गया है। निजी स्कूलों के खेल मैदान और खेल के साधन दिखाए गए हैं, जबकि सरकारी स्कूलों के मैदान खाली और उजड़े हुए दिखाए गए हैं।
लेबोरेटरी और लाइब्रेरी की भी तुलना
डॉक्यूमेंट्री में निजी और सरकारी स्कूलों की लेबोरेटरी तथा लाइब्रेरी की भी तुलना की गई है। इसमें दिखाया गया है कि निजी स्कूलों में बच्चों को आधुनिक लेबोरेटरी और लाइब्रेरी की सुविधा मिलती है। दूसरी ओर अनुदानित और कम फीस वाले स्कूलों की लेबोरेटरी और लाइब्रेरी की खस्ता हालत दिखाई गई है।
ट्रांसपोर्टेशन का भी उल्लेख
अभिभावक स्कूलों की ट्रांसपोर्ट फीस से भी नाराज हैं। उनका आरोप है कि स्कूल बस की फीस बहुत ज्यादा है। इस मामले को लेकर स्कूलों के बाहर कई बार अभिभावकों ने विरोध प्रदर्शन किया। डॉक्यूमेंट्री में स्कूल बस और स्कूल ऑटो के बीच अंतर दिखाकर ज्यादा फीस को तर्कसंगत बताने की कोशिश की गई है।
सारा खेल फीस वसूलने का
निजी स्कूलों ने यह डॉक्यूमेंट्री फीस वसूलने के उद्देश्य से बनाई है। वह अभिभावकों को जताना चाहते हैं कि अगर वह तगड़ी फीस वसूल रहे हैं तो इसकी एवज में उनके बच्चों को बेहतर सुविधाएं भी दे रहे हैं। सात से आठ मिनट की डॉक्यूमेंट्री में ज्यादा फीस देने से क्या लाभ होता है, इस पर जोर दिया गया है।
एफआरसी पर उठाए सवाल
डॉक्यूमेंट्री में फीस नियामक समिति (एफआरसी) को आड़े हाथ लिया गया है और इस पर कई सवाल खड़े किए गए हैं। अभिभावकों से डॉक्यूमेंट्री में पूछा गया है कि यह देखने के बाद आप स्कूल के साथ हैं या एफआरसी के साथ। डॉक्यूमेंट्री की सीडी और लिंक अभिभावकों को भेजी जा रही है। इसे देखने के बाद अभिभावकों की राय भी मांगी गई है।
स्कूल के साथ होने का फॉर्म
स्कूलों ने डॉक्यूमेंट्री और लिंक के साथ अभिभावकों को एक फॉर्म दिया है। इसमें उनके स्कूल के समर्थन में होने के हस्ताक्षर करवाए जा रहे हैं, ताकि कोई अभिभावक एफआरसी या सरकार के समक्ष शिकायत करने नहीं जाए और अगर कोई स्कूल के खिलाफ आवाज उठाए तो इस फॉर्म के जरिए अपना बचाव किया जा सके।
पूरा शहर जानता है, एफआरसी अनजान
निजी स्कूलों की डॉक्यूमेंट्री के बारे में शहरभर में चर्चा चल रही है, लेकिन एफआरसी इससे अनजान है। एफआरसी के सदस्यों का कहना है कि स्कूल डॉक्यूमेंट्री में एफआरसी का उल्लेख नहीं कर सकते। स्कूल फीस वसूलने के लिए कोई डॉक्यूमेंट्री बनाते हैं तो यह स्कूल का निजी विषय है। एफआरसी का इससे कुछ लेना-देना नहीं है। जो स्कूल एफिडेविट और प्रपोजल जमा करेगा, उसकी फीस एफआरसी तय करेगी।
Published on:
28 Apr 2018 08:57 pm
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