
Dangerous Bacteria Found in Udaipur Lakes (Patrika Photo)
Udaipur Lake Pollution: उदयपुर शहर की झीलें बाहर से स्वच्छ नजर आती हैं, लेकिन इन झीलों में ऐसा बैक्टीरिया पनप चुका है जिसका कोई इलाज ही नहीं है। पिछोला, फतहसागर और बड़ी झील में भी यह जीवाणु फैल चुका है। अब यह बैक्टीरिया शहर के लिए भी खतरनाक साबित हो रहा है।
विश्व झील दिवस पर पत्रिका की पड़ताल में झीलों के पानी की सामान्य जांच करवाने पर पिछोला, बड़ी और फतहसागर का पानी साफ नजर आया। इसके बाद सुखाड़िया विवि के बायोटेक्नोलॉजी और माइक्रोबायोलॉजी विभाग के साथ इन तीनों झीलों के पानी की सूक्ष्मता से जांच रिपोर्ट देखी तो सामने आया कि तीनों झीलों में खतरनाक बैक्टीरिया पनप चुका है, जो धीरे-धीरे इसके पानी को जानलेवा बना रहा है। यह ट्रीटमेंट के बावजूद मरता नहीं और एक बार इंसान के शरीर में पहुंचने के बाद एंटीबायोटिक्स का असर तक नहीं होता। यह कई खतरनाक बीमारियां हमारे शरीर में पैदा करता है।
जांच के अनुसार, शहर की प्रमुख झीलों पिछोला, फतहसागर, बड़ी और रंगसागर का पानी जानलेवा और एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी (एएमआर) बैक्टीरिया से संक्रमित हो चुका है। यह स्थिति इसलिए भयावह है, क्योंकि इन्हीं झीलों से शहर की बड़ी आबादी को पेयजल सप्लाई किया जाता है। पिछोला झील के 34 प्रतिशत नमूनों में एमईसी-ए, जीन संबंधित एमआरएसए स्ट्रेन मिला। वहीं, फतहसागर झील में 27 प्रतिशत नमूनों में एमआरएसए स्ट्रेन की पुष्टि हुई।
एमईसी-ए, जीन बैक्टीरिया के अंदर पाया जाने वाला विशेष जेनेटिक हिस्सा है, जो उसे एंटीबायोटिक दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता देता है। बायोटेक्नोलॉजी विभाग की शोधार्थी भूमिका डोडेजा ने फतहसागर और पिछोला झील से पानी के 52 सैंपल लिए। इनमें से 220 अलग-अलग प्रकार के बैक्टीरिया को छानकर या अलग करके निकाला।
इन बैक्टीरिया का डीएनए टेस्ट किया। इस टेस्ट से यह पता लगाया कि बैक्टीरिया की असल बनावट कैसी है और उसमें कौन से खतरनाक जीन मौजूद हैं। इन बैक्टीरिया पर दवाओं का असर चेक किया। इतना सब करने के बाद पानी में मेथिसिलिन प्रतिरोधी स्टैफिलोकोकस ऑरियस (एमआरएसए) स्ट्रेन की पुष्टि हुई। आसान शब्दों में एमआरएसए एक बैक्टीरिया है। यह एक ऐसा जिद्दी बैक्टीरिया है, जिस पर हमारी सामान्य एंटीबायोटिक दवाइयां बेअसर हो जाती हैं।
यह बैक्टीरिया पेनिसिलिन और सेफलोस्पोरिन जैसी जीवनरक्षक दवाओं को निष्प्रभावी कर देता है। इसके संक्रमण से स्केल्डेड स्किन सिंड्रोम, निमोनिया, फोड़े-फुंसी, फूड पॉइजनिंग, सेप्टिसीमिया और टॉक्सिक शॉक सिंड्रोम जैसी घातक बीमारियां हो सकती हैं। वैश्विक स्तर पर सिर्फ मेथिसिलिन प्रतिरोध के कारण हर साल 12,000 मौतें दर्ज होती हैं।
माइक्रोबायोलॉजी विभाग की शोधार्थी विधि जैन ने बड़ी, पिछोला, फतहसागर और रंगसागर में बेसिलस बैक्टीरिया का पता लगाने के लिए 45 सैंपल लिए। इसके लिए बड़ी, पिछोला और फतहसागर से 12-12 व रंगसागर से 9 सैंपल लिए। जांच के बाद इन झीलों में बैसिलस समूह के बैक्टीरिया की मौजूदगी पाई गई। ये बैक्टीरिया वाटर ट्रीटमेंट प्लांट जहां शहर का पेयजल साफ होता है से गुजरने के बाद भी ये जिंदा रह जाते हैं और नलों के जरिए हमारे घरों तक पहुंच सकते हैं।
सबसे ज्यादा बैसिलस बैक्टीरिया के एंडोस्पोर बड़ी झील के पानी में मिले हैं। ये मल्टीड्रग रेजिस्टेंट हैं यानी इस बैक्टीरिया पर कई दवाइयों का असर नहीं होता। जांच में पता चला है कि झीलों में मौजूद लगभग आधे (47.22%) बैक्टीरिया मल्टीड्रग रेजिस्टेंट हैं। पिछोला और रंग सागर के 59% बैक्टीरिया, जबकि बड़ी और फतहसागर के 50% बैक्टीरिया इतने खतरनाक हैं कि इंसान के शरीर में जाने पर आम दवाइयों से इनका इलाज नामुमकिन है।
| झील | बीसीएलएस आइसोलेट्स | एमआरएसए स्ट्रेन संक्रमण दर |
|---|---|---|
| पिछोला झील | 59% | 34% (सर्वाधिक) |
| फतेहसागर झील | 50% | 27% |
| बड़ी झील | 50% | — |
| रंग सागर झील | 59% | — |
यह स्थिति प्रदूषण तक सीमित नहीं रही, झीलों का खतरनाक बैक्टीरिया फूड चेन तक पहुंच गया। आसान शब्दों में इसका मतलब यह है कि जब गायें या अन्य मवेशी इन झीलों का दूषित पानी पीते हैं तो ये कीटाणु उनके शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। उनके दूध के जरिए रसोई और बच्चों के पेट तक पहुंच रहे हैं। इसे हॉरिजॉन्टल जीन ट्रांसफर कहते हैं। यह खाद्य श्रृंखला के लिए खतरे की घंटी है। दूध और उससे बनी चीजें से लाइलाज बैक्टीरिया शरीर में पहुंचकर गंभीर रूप से बीमार कर सकते हैं। इस चक्र को तोड़ने के लिए जल स्रोतों को तुरंत प्रदूषण मुक्त करना होगा।
-डॉ. हर्षदा जोशी, सह आचार्य, बायोटेक्नोलॉजी विभाग
झीलों में सीवर का लीकेज, सीधे गिरने वाले नाले, घरों व होटलों के कचरे से पानी में ऐसे खतरनाक कीटाणु पैदा हो रहे रहे हैं जिन पर दवाइयों का असर नहीं होता। इससे बचने के लिए जलदाय विभाग और नगर निगम को अब पानी की सिर्फ टीडीएस जैसी आम जांचों पर निर्भर न रहकर, इन कीटाणुओं और उनके डीएनए की भी जांच करनी चाहिए। झीलों में बिना साफ किए गंदा पानी गिरने से तुरंत रोका जाना चाहिए और पानी साफ करने के पुराने तरीके (क्लोरीन) की जगह आधुनिक तकनीक अपनानी चाहिए जो इन खतरनाक कीटाणुओं को मार सके।
-डॉ. नमिता आशीष सिंह, सह आचार्य माइक्रोबायोलॉजी विभाग
Updated on:
29 Aug 2026 08:40 am
Published on:
29 Aug 2026 08:40 am
