
पैराडाइज लेक में एनसीसी कैडेट की जान जाने के बाद प्रशासन पर उठे गंभीर सवाल
उदयपुर. जिले में बंद और लावारिस पड़ी खदानें अब गहरे जानलेवा जाल में तब्दील हो चुकी हैं। शनिवार को गोवर्धन विलास इलाके की बंद पड़ी पैराडाइज खदान में बीएन कॉलेज की 19 वर्षीय एनसीसी कैडेट वैभवी राजोरा की संदिग्ध परिस्थितियों में डूबने से मौत हो गई। इस हादसे ने राजस्थान सरकार की माइन क्लोजर और रिक्लेमेशन पॉलिसी और खनन विभाग की लापरवाही की पोल खोलकर रख दी है।
खदानों में मौत का सिलसिला बदस्तूर जारी
पैराडाइज लेक में हुआ यह हादसा कोई पहला मामला नहीं है। पिछले कुछ महीनों में बंद पड़ी इन खदानों ने कई मासूम जिंदगियां छीनी हैं:
मई 2026 (उमरड़ा):क्रेशर प्लांट के पास स्थित एक गहरी खदान में भरे पानी में डूबने से दो चचेरे भाइयों की मौत हो गई।
जून 2026 (कुराबड़): 40 फीट गहरी पानी से भरी खदान में गिरने से 12 वर्षीय बच्ची डूबी, और उसे बचाने के लिए खदान में कूदी मां की भी डूबने से जान चली गई।
अगस्त 2025 (डबोक): कुंवारी माइंस में बकरियां चराने गए 4 नाबालिग बच्चों की खदान के पानी में डूबने से दर्दनाक मौत हुई थी, जिसके बाद ग्रामीणों ने जमकर विरोध प्रदर्शन किया था।
मौत के गड्ढे बने टूरिस्ट स्पॉट, सुरक्षा नदारद
जिस पैराडाइज खदान में कल छात्रा की मौत हुई, उसे सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर किसी खूबसूरत टूरिस्ट स्पॉट की तरह प्रचारित किया जा रहा है। यहां रोज सैकड़ों देशी पर्यटक पहुंच रहे हैं। लोकल गाइड विदेशी पर्यटकों को यहां ला रहे हैं। इन्हें यहां आने से रोकने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। हैरान करने वाली बात यह है कि यहां न तो कोई सुरक्षा गार्ड तैनात है, न चेतावनी बोर्ड और न ही कोई मजबूत तारबंदी। जिला प्रशासन और पर्यटन विभाग की अनदेखी के चलते विदेशी सैलानियों की जान भी हर वक्त खतरे में बनी रहती है।
कागजों में सिमटी पॉलिसी
खनन नियमों (2017) और राजस्थान मिनरल पॉलिसी के तहत खदान संचालकों के लिए जमीन का पुनर्द्धार(रिक्लेमिनेशनपॉलीसी) कानूनी रूप से अनिवार्य है।
क्लोजर प्लान: खदान बंद होने से पहले फाइनल माइन क्लोजर प्लान स्वीकृत कराना जरूरी है।
सुरक्षा और ढलान: खुले गड्ढों को 30 डिग्री से कम की सुरक्षित ढलान देकर वाटर बॉडी में बदला जाए और रास्तों को सील या फेंस किया जाए।
री-ग्रासिंग और वनीकरण: सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार जमीन पर हरियाली (घास/पेड़) लगाना अनिवार्य है ताकि जमीन पशुओं और पर्यावरण के अनुकूल बने।
जमीन की वापसी:रिक्लेमेशन के बाद सुरक्षित जमीन ग्राम पंचायत को गोचर या सामुदायिक उपयोग के लिए सौंपी जानी चाहिए।
फाइनेंशियल एश्योरेंस: खदान संचालक से सुरक्षा राशि जमा कराई जाती है, ताकि काम न करने पर सरकार खुद उस पैसे से सुधार करवा सके।
जमीनी हकीकत यह है कि उदयपुर जिले में 156 से ज्यादा खदानें बंद या लावारिस पड़ी हैं, जहां इस नीति का 1% भी पालन नहीं हो रहा है। न कोई फेंसिंग है, न री-ग्रासिंग और न ही सुरक्षा राशि जब्त कर विभाग ने खुद कोई सुधार कार्य कराया।
अधिकारियों का तर्क- मांग खत्म हुई, खनिज नहीं
जिले में 156 से ज्यादा खदानों को असुरक्षित छोड़ने पर जब विभागीय अधिकारियों से सवाल किया, तो उन्होंने बेहद गैर-जिम्मेदाराना तर्क दिया। अधिकारियों का कहना है कि इन खदानों को आधिकारिक तौर पर इसलिए भरा नहीं किया जा रहा है क्योंकि इनमें खनिज पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। कई खदानें ऐसी हैं जिनके खनिज की वर्तमान में बाजार में मांग नहीं है। भविष्य में यदि मांग दोबारा शुरू हुई, तो खनन किया जा सकता है, इसलिए इन्हें क्लोजर पॉलिसी के तहत बंद नहीं किया गया है।
Updated on:
21 Sept 2026 06:07 pm
Published on:
21 Sept 2026 06:07 pm
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