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उदयपुर में TRI की दीवार पर देख सकेंगे जनजातीय विरासत की जीवंत झलक, राजस्थान से गुजरात तक 17 राज्यों की लोक कला बनेगी पहचान

यह दीवार दूर से देखने पर जनजातीय गैलरी जैसी प्रतीत होती है जो न सिर्फ सुंदरता बढ़ा रही है बल्कि संस्कृति का संदेश भी दे रही है। इन कलाकृतियों के चित्रण का शुक्रवार को जनजाति मंत्री बाबूलाल खराड़ी अनावरण करेंगे।

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Udaipur Municipal Corporation

जनजातीय रंगों में रंगा दुर्गानर्सरी चौराहा (फोटो- पत्रिका)

Udaipur: उदयपुर शहर के सबसे व्यस्ततम चौराहों में से एक दुर्गानर्सरी चौराहा अब सिर्फ ट्रैफिक का केंद्र नहीं, बल्कि भारत की जनजातीय विविधता का कलात्मक प्रतीक बन गया है। जनजाति कार्यालय की दीवार पर अलग-अलग राज्यों की जीवंत झलक की कलाकृतियां बनाई है। इसमें राजस्थान से झारखंड, गुजरात से महाराष्ट्र तक के 17 राज्यों की लोककलाओं को यहां उकेरा है।

यह दीवार दूर से देखने पर जनजातीय गैलरी जैसी प्रतीत होती है, जो न सिर्फ सुंदरता बढ़ा रही है। बल्कि संस्कृति का संदेश भी दे रही है। इन कलाकृतियों के चित्रण का शुक्रवार को जनजाति मंत्री बाबूलाल खराड़ी अनावरण करेंगे। इस अवसर पर संभागीय आयुक्त प्रज्ञा केवलरमानी और जनजाति आयुक्त ओपी जैन भी मौजूद रहेंगे।

गौरतलब है कि नगर निगम ने चौराहे को चौड़ा करने के लिए टीआरआई की करीब 10 फीट जमीन ली थी। इसके बाद निगम ने 10 फीट पीछे नई दीवार बनवाकर रोड को चौड़ा किया था। इस दीवार को आकर्षक बनाने के लिए यहां पेटिंग्स की गई। दीवार पर 21 पैनल बनाए गए है, जिनमें से 17 पैनलों पर अलग-अलग राज्यों की जनजातीय पेंटिंग्स, भित्ति चित्र और 4 पैनलों पर विविध कलाकृतियां उकेरी है।

पेंटिंग्स में भारत के विभिन्न राज्यों की जनजाति विरासत दर्शाई

-राजस्थान के उदयपुर, डूंगरपुर और बांसवाड़ा जिले की मांडणा कला- जो मिट्टी और चूने से बने पारंपरिक चित्र महिलाएं घरों की दीवारों पर बनाती हैं, जो शुभता और समृद्धि का प्रतीक है।
-मध्यप्रदेश की गोंड पेंटिंग- पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं और लोककथाओं को सजाने वाली यह कला विश्व प्रसिद्ध है।
-महाराष्ट्र की वारली पेंटिंग- सफेद रंग से मिट्टी की दीवारों पर बने मानव आकृतियों वाले चित्र जीवन के उत्सव और एकता का प्रतीक है।
झारखंड की सोहराई पेंटिंग- यह कला फसल कटाई और पशुपालन से जुड़ी खुशियों का चित्रण करती है, मिट्टी के प्राकृतिक रंगों में गढ़ी जाती है।
-राजस्थान के बारां की सहरिया भित्ति चित्रकला- जंगल और जीव जंतुओं से प्रेरित पारंपरिक लोकचित्र, जो आदिवासी जीवन की सरलता को दर्शाते हैं।
-गुजरात की पिथोड़ा पेंटिंग- भील जनजाति की यह पारंपरिक चित्रकला, धार्मिक और सामाजिक अवसरों पर बनाई जाती है, जिसमें देवताओं और नृत्य दृश्यों का वर्णन होता है।
-बंगाल की संथाल कला- नृत्य और लोकसंगीत से भरे चित्र संथाल समुदाय की जीवंत संस्कृति को बयान करते हैं।
-ओडिशा की कुरुंबा और सोहरा कला- इन पेंटिंग्स में प्रकृति, पशु-पक्षी और लोककथाओं का सुंदर संगम दिखाई देता है।
-कोटा, बूंदी की मीणा जनजातीय कला- रंगों की नाजुकता और भावों की गहराई से भरी ये भित्तियां जनजीवन की झलक पेश करती हैं।
-डूंगरपुर और झाबुआ मध्यप्रदेश की भील पेंटिंग्स- बिंदुओं और प्रतीकों के माध्यम से जीवन के त्योहारों और लोकदेवताओं का चित्रण करती हैं।
-मेवाड़ की गवरी थीम पेंटिंग्स- गवरी नाट्य परंपरा पर आधारित यह कलाकृति मेवाड़ की सांस्कृतिक आत्मा को दर्शाती है।
-अन्य पैनल में आदिवासी शादी-ब्याह की रस्मों के रंग, संगीत और परंपरा को उकेरा है।


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