
मो. इलियास/ उदयपुर . मेवाड़ रियासतकालीन का विलय होने के बाद हाथीपोल कोतवाली ऐसा थाना था जिसके अधीन पूरा शहर आता था। कम नफरी के बावजूद उस समय थानेदार हो या कांस्टेबल घोड़ों की टाप और पैदल ही क्रॉस में गश्त करते थे। रात को उनके पहरे के दौरान कोई भी अपने मकान से बाहर निकलने से पूर्व दस बार सोचता था। पुलिस धाक व अनुशासन की ऐसी मिसाल थी कि लोग उन्हें सम्मान के साथ देखते थे। पुलिस के नाम से हर व्यक्ति कांपता था। ग्रामीण क्षेत्र में तो जागीरदार, मुखिया, पटेल को थानेदार को ओहदा प्राप्त था। छोटे-मोटे झगड़े वे अपने स्तर पर पंचायत में निपटा देते थे। संगीन मामलों की सूचना ही पुलिस तक पहुंच पाती थी।
पहली एफआईआर कटी धोखाधड़ी की
हाथीपोल कोतवाली थाने में वर्ष 1963 में सबसे पहले मुकदमा धोखाधड़ी का दर्ज हुआ। मामले में तफ्तीश के बाद चालान भी पेश हुआ। जनसंख्या बढ़ोतरी के बाद घंटाघर व सूरजपोल थाना बनाया गया। उदयपुर शहर की सीमा क्षेत्र पूर्व में राजसमंद के भीम तक था। समय के साथ ही देलवाड़ा से भीम तक राजसमंद जिले को अलग किया गया। आज भी उदयपुर जिला राजस्थान में थानों की दृष्टि से बड़ा जिला है, जिसमें 43 थाने हैं।
पहरा संतरी पहनते थे साफे
वर्ष 1963 में पुलिस की वर्दी में शर्ट के साथ लम्बी निकर शामिल थी। जूते व निकर के बीच के हिस्से में सफेद रंग के हॉज स्टॉक हुआ करते थे। लम्बी साइट कैप व पहरा संतरी के सिर पर साफा अलग से पहचान थी। 1968 के बाद पुलिस की वर्दी में पेंट शामिल हुई। उसके तत्कालीन अधिकारी के समक्ष पुलिस पूरी अनुशासन में थी। अगर अधिकारी दौरे पर होते थे, उससे पहले चाक चौबंद व्यवस्था की जाती थी। उस समय थानेदार व कांस्टेबल सभी पैदल व घोड़ों से गश्त किया करते हैंं।
ग्रामीण क्षेत्र में ऊंट से होती थी गश्त
वाहनों के अभाव में ग्रामीण क्षेत्र में ऊंट पर गश्त हुआ करती थी। थानेदार व अन्य पुलिसकर्मी पैदल के साथ ही ऊंट पर घूमा करते थे। ऊंट सवार को उस वक्त सूत्तर सवार बोला जाता था। समय के साथ पुलिस विभाग से ऊंट गायब हो गए, लेकिन आज भी घोड़े विभाग के पास है लेकिन गश्त की बजाय उन्हें बड़े आयोजनों में कानून एवं व्यवस्था के दौरान काम में लिया जाता है।
Published on:
18 Apr 2018 02:23 pm
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