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5 साल में सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या में 1.3 करोड़ की कमी

देश के 20 राज्यों में पिछले पांच वर्षों के दौरान सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या में 1.3 करोड़ की कमी आई है, जबकि दूसरी ओर निजी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या में 1.7 करोड़ का इजाफा हुआ है।
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अंबिकापुर

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Santosh Trivedi

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Updated: 18 Apr 2017, 2:19 PM IST

देश के 20 राज्यों में पिछले पांच वर्षों के दौरान सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या में 1.3 करोड़ की कमी आई है, जबकि दूसरी ओर निजी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या में 1.7 करोड़ का इजाफा हुआ है। हाल ही में आए एक अध्ययन में यह खुलासा हुआ, जो देश के सरकारी स्कूलों में शिक्षा की खस्ताहालत को बयां करती है।

लंदन के इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन में प्रोफेसर गीता गांधी किंगडन ने अपने अध्ययन में कहा है कि बीते पांच वर्षों के दौरान वेतनभोगी अध्यापकों वाले स्कूलों में विद्यार्थियों के पंजीकरण का औसत 122 से घटकर 108 रह गई है, जबकि निजी स्कूलों में यह औसत 202 से बढ़कर 208 हो चुका है।

शिक्षा के लिए जिला सूचना प्रणाली (डीआईएसई) और शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, इन 20 राज्यों में स्कूल जाने वाले 65 फीसदी विद्यार्थी (11.3 करोड़) सरकारी स्कूलों में ही अपनी शिक्षा को जारी रखा है।

14 वर्ष तक की आयु के विद्यार्थियों को निशुल्क शिक्षा मुहैया करा रहे सरकारी स्कूलों को छोड़कर तगड़ी फीस वसूलने वाले निजी स्कूलों की ओर विद्यार्थियों के स्थानांतरण पर अध्ययन में कहा गया है कि परिजनों के बीच प्रचलित धारणा, कि निजी स्कूलों में बेहतर शिक्षा प्रदान की जाती है, के कारण यह स्थानांतरण हुआ है।

जबकि तमाम मूल्यांकन के दौरान खुलासा हुआ है कि विद्यार्थियों की शिक्षा गुणवत्ता के मामले में ये निजी स्कूल, सरकारी स्कूलों के समान ही बदतर हैं, या कुछ अध्ययनों में कहा गया है कि वे सरकारी स्कूलों से बेहतर नहीं हैं। सर्व शिक्षा अभियान पर 1.16 लाख करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद 2009 से 2014 के बीच बच्चों में समझ के स्तर में गिरावट दर्ज की गई है।

प्रशिक्षित प्राथमिक चिकित्सकों का प्रतिशत 20 से भी कम है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में, जो प्रति व्यक्ति आय के मामले में देश का सबसे अमीर शहर भी है, सरकारी स्कूलों में आधे से अधिक शिक्षकों की नियुक्ति संविदा पर की गई है। पूर्णकालिक वेतनभोगी अध्यापकों की तुलना में संविदा पर नियुक्त शिक्षकों में न तो शिक्षण के प्रति उत्साह दिखाई देता है और न ही वे खुद पर किसी तरह की जवाबदेही मानते हैं।

शिक्षा की स्थिति पर वार्षिक रिपोर्ट (एएसईआर) के अनुसार, हालांकि केरल में इस दौरान सरकारी स्कूलों में दाखिले का अनुपात निजी स्कूलों की अपेक्षा बढ़ा है। केरल में 2014 में जहां 40.6 फीसदी बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे, वहीं 2016 में यह बढ़कर 49.9 फीसदी हो गया। वहीं पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में सरकारी स्कूलों में पढऩे वाले बच्चों में समझ का स्तर निजी स्कूलों की अपेक्षा बेहतर पाया गया।

केरल और तमिलनाडु में प्राथमिक स्कूलों को निजी स्कूलों की अपेक्षा बेहतर माना जाता है और 2011 से 2014 के बीच बच्चों की शिक्षा के स्तर में वृद्धि भी दर्ज की गई है। अपने अध्ययन में गांधी कहती हैं कि सरकारी स्कूलों का बेहतर संचालन करने वाले राज्यों में महंगे निजी स्कूलों की संख्या अधिक है, क्योंकि इन राज्यों में अपेक्षाकृत कम शुल्क लेकर शिक्षा देने वाले निजी स्कूलों की जरूरत भी कम है।

इससे पता चलता है कि बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और ओडिशा जैसे गरीब राज्यों में निजी स्कूलों में पढऩे वाले 70 से 85 फीसदी बच्चे क्यों 500 रुपये प्रति महीने से भी कम फीस देते हैं। इन राज्यों में 80 फीसदी निजी स्कूल अपेक्षाकृत कम शुल्क लेने वाले स्कूल हैं। पिछले 10 वर्षों में पहली बार 2016 में देश के ग्रामीण इलाकों में स्थित निजी स्कूलों में दाखिला नहीं बढ़ा, बल्कि 2014 में 30.8 फीसदी की अपेक्षा घटकर 2016 में 30.5 फीसदी हो गया। हालांकि 2010-11 से 2015-16 के बीच देश में निजी स्कूलों की संख्या में 35 फीसदी का इजाफा हुआ, जबकि इसी अवधि में सरकारी स्कूलों की संख्या सिर्फ एक फीसदी बढ़ी।