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exclusive interview : अपनी 48 दिनों की अखंड मौन साधना के बाद मुनि पूज्य सागर अपने माता-पिता को याद कर हुए भावुक, जानें और क्या बोले मुनि सागर महाराज
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exclusive interview : अपनी 48 दिनों की अखंड मौन साधना के बाद मुनि पूज्य सागर अपने माता-पिता को याद कर हुए भावुक, जानें और क्या बोले मुनि सागर महाराज

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Sonam Ranawat

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Updated: 20 Sep 2018, 2:13 PM IST

कालीचरण /मदनगंज-किशनगढ़. मैं माता-पिता और मुझे साधना के पथ आगे बढ़ाने वाली आर्यिका वर्धितमति के प्रति जीवनभर मन से कृतज्ञ हूं और रहूंगा भी। अपनी 48 दिन की अखंड मौन साधना के बाद मुनि पूज्य सागर ने पत्रिका से सीधी बातचीत की। मुनि पूज्य सागर बातचीत में माता-पिता की कृतज्ञता को याद कर भावुक भी हो गए। मुनि पूज्य सागर ने पत्रिका से बातचीत में अपने चिंतन के दिनों, साधना में लिए संकल्प और कई मार्मिक अनुभवों को साझा भी किया। साथ ही युवा पीढ़ी को धर्म और संस्कृति से जुडऩे का संदेश भी दिया।

सवाल : 48 दिन की मौन साधना संकल्प क्यों लिया और यह विचार क्यों और कैसे आया।

जवाब : अगर संस्कार की बात करे तो यह एक जन्म के संस्कार नहीं होते बल्कि कई जन्मों के संस्कार होते है। साधना के पथ पर व्यक्ति बढ़ता है और अनुष्ठान पूजन जाप करता है। इसका जन्मस्थान श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) में हुआ। वहां एक साल रहने के दौरान मैंने स्वामी चारूकीर्ति से कहा कि आपने मुझे कुछ सिखाया ही नहीं मैं यहां रहकर क्या करूंगा। इस पर उन्होंने कहा नीचे चलते है। नीचे भंडार बस्ती मंदिर की परिक्रमा करने के दौरान जो लगभग एक किलोमीटर की है वहां उस समय उड़ती चिडिय़ाओं और उनके बच्चों को दिखाते हुए स्वामी चारूकीर्ति ने कहा कि यह अपने आप उडऩा सीखते है। चिडिय़ा अपने बच्चों को दाना-पानी देती है लेकिन उडऩा नहीं सिखाती है। इसी तरह तुम्हे रहने की जगह दी, किताबें दी, परिचय करवाया अब सिखना तुमको है। यह मौन साधना भी पिछले 12 वर्ष के संस्कार का परिणाम है।

 

सवाल : चातुर्मास में अक्सर संत और मुनि प्रवचन देना ज्यादा पसंद करते है फिर चातुर्मास में आपने मौन साधना का ही निर्णय क्यों लिया।

जवाब : प्रवचन कार्यक्रम कराना धर्म प्रभावना का कार्य है। आत्म प्रभावना के लिए स्वयं की साधना करती होती है। अखंड मौन साधना से यह अनुभव आया कि आत्म साधना में आनंद बहुत है यह अच्छी अनुभूति है। मन में यह संकल्प बना लिया है कि अब प्रतिदिन कम से कम 12 घंटे का मौन रहूंगा।

 

सवाल : –– अखंड मौन साधना के दौरान किस बात ने आपकों सबसे ज्यादा चिंतित किया।

जवाब : एक तो कभी पूजन सामग्र्री में कमी आ जाती थी तो चिंता बढ़ जाती थी। चिंतन के दौरान माता-पिता के साथ रहे दिनों का स्मरण आए। साधना पथ पर आने से पहले स्कूल में पढऩे के दौरान दूसरे विद्यार्थियों काल में मेरे पिता को कुछ लोगों से सुनना पड़ा। जब यह बात चिंतन में आई तो मैं दु:खी हुआ। फिर कर्म सिद्धांत का चिंतन आया कि जो उनका कर्म उदय था जो उसके कारण उन्हें सुनना पड़ा और उसका निमित मैं बना। सामाजिक व्यवस्थाओं को लेकर भी बाते चिंतन में याद आई। इसका यही निष्कर्ष निकला कि हम हठाग्रह छोड़ दे जीवन सुखी हो जाएगा।

 

 

 

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