
नगर संस्थापक राव बीका ने सन् 1488 में बीकानेर नगर की स्थापना कर ‘चंदा’ उड़ाया और नगर की खुशहाली, समृद्धि, व यश की कामना की। विशिष्ट गोलाई लिए आकार, सुन्दर एवं कलात्मक चित्रकारी तथा दोहे लिखे ‘चंदे’ बीकानेर शहर की विशेष पहचान है। नगर स्थापना दिवस पर पतंगबाजी के साथ इनको उड़ाने की परम्परा रही है। इस परम्परा को नगरवासी शताब्दियों बाद आज भी सहेजकर रखे हुए है।
कभी मथेरण कला के चित्रों से सजे रहे वाले ‘चंदा’ आज भी चित्र, दोहों और संदेश के साथ आकाश में आखाबीज और आखातीज के दिन उड़ान भरते है। डोरी के माध्यम से उड़ाए जाने वाले इन ‘चंदे’ की उड़ान के दौरान इन पर लगी पताका, पूंछ में लटकता केशरिया पेचा हर किसी को इनकी ओर आकर्षित करता है।
‘चंदा’ उड़ाने के दौरान बच्चों से बुजुर्गो तक एक साथ गाया जाने वाला ‘गवरा दादी पून दे, टाबरियों रा चंदा उड़े’ दोहे का सामूहिक गायन लोक प्रचलित है। इस बार 17 व 18 अप्रेल को नगर स्थापना दिवस के अवसर पर उडऩे वाले ‘चंदा’ का न केवल निर्माण शुरू हो गया है बल्कि ‘चंदा’ के माध्यम से आमजन को जागरूक करने वाले संदेश और चित्र भी बनाए जा रहे है।
चित्र व दोहे विशेष
चंदा बनाने के कलाकार बृजेश्वर लाल बताते हैं कि ‘चंदा’ पर की जानी वाली चित्रकारी और लिखे जाने वाले दोहे विशेष एवं पारम्परिक है। उन्होंने बताया कि पूर्व में मथेरण जाति के कलाकार इन चंदों पर कलात्मक चित्रकारी उकेरते रहे है। वर्तमान में कई अन्य कलाकार भी इनका निर्माण कर रहे है।
बीकानेर के राजा-महाराजाओ, मां करणी, नगर संस्थापक राव बीका सहित आमजन को संदेश देने वाले चित्र ‘चंदा’ पर उकेरे जाते है। इस बार बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, कन्या भ्रूण हत्या रोकथाम, बाल विवाह रोकथाम आदि विषयों का संदेश चंदा के माध्यम से दिया जाएगा।
इनसे बनता है ‘चंदा’
नगर स्थापना दिवस पर आखाबीज और आखातीज के दिन उड़ाए जाने वाले ‘चंदे’ की कलात्मकता, चित्रकारी और विशिष्ट बनावट देखते ही बनती है। चंदा बनाने वाले कलाकार गणेश लाल व्यास बताते है कि ‘चंदा’ बनाने में पुरानी बहियों का कागज अथवा मोटा सादा कागज, सरकण्डा, पाठा डोरी, ल्याई अथवा गोंद, कपड़ा, छोटी घ्वज सामग्री से इनको बनाया जाता है।