
सांगोद. गांवों के विकास के सरकार के तमाम दावों के बीच आज भी बारिश के दिनों में ग्रामीणों की आवागमन की राह आसान नहीं है। आजादी के सात दशक में बातें तो खूब हुईं लेकिन बरसों पुरानी रपट की ऊंचाई नहीं बढ़ाने से आज भी ग्रामीण जान जोखिम में डालकर आवागमन को मजबूर हैं। इसकी बानगी क्षेत्र में बनी करीब आधा दर्जन से अधिक रियासतकालीन रपटें हैं।
इनकी उंचाई कम होने से नदी में पानी की आवक होते ही ये डूब जाती हैं। बारिश में कई माह तक गांवों का सम्पर्क बड़े कस्बों से कटा रहता है। जरूरत पर लोग जान जोखिम में डालकर आवागमन करते हैं। रोलाना, किशनपुरा व करीरिया में उजाड़ नदी की रपटों पर महीनों तक पानी की चादर चलती है। कनवास में बस स्टैण्ड के पास अरू नदी पर बनी मसानी पुलिया पर पानी होने से सांगोद-दरा मार्ग बंद हो जाता है। वहीं थाने के पीछे की रपट पर पानी होने से रामनगर की टापरिया गांव टापू बन जाता है।
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यहां बंद आवागमन
थूनपुर में कालीसिंध नदी पर बनी बालाजी की थाक रपट पर पानी आने से बारिश में बार-बार आवागमन बंद होता है। कई बार तो एक-एक माह तक चारचौमा वाया कुंदनपुर मार्ग बाधित रहता है। कुंदनपुर में उजाड़ नदी पर की रपट की हालत भी कुछ ऐसी ही है। उजाड़ में पानी की जरा सी आवक होते ही नदी पार बसे मण्डाप, किशनपुरा, घाटोलिया, थेहरोली, घटाल, अतरालिया, आमली आदि गांवों का सम्पर्क बार-बार बाधित होता है।घूमकर आते-जाते हैं
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रपटों पर पानी होने से ग्रामीणों को जरूरत पर मार्ग बदल कर आवागमन करना पड़ता है। सांगोद से चारचौमा जाने के लिए कैथून होकर तो मण्डाप, घाटोलिया व इससे जुड़े गांवों तक आने-जाने के लिए सांगोद से घानाहेड़ा मार्ग पर आवागमन करना पड़ता है। ऐसे में समय के साथ धन की भी बरबादी होती है। कई गांव तो ऐसे हैं जहां रपटों पर पानी होने से आवागमन का विकल्प ही नहीं है।