
शिवभान सिंह, हुकुमदत्त भार्गव.
शाहाबाद (बारां). नि:शुल्क राशन, शिक्षा और चिकित्सा के सरकारी दावों से इतर आदिवासी इलाकों ( tribal areas ) में जीवन कितना मुश्किल है, इसका अनुमान केवल इसी बात से लगाया जा सकता है कि जीवन यापन के लिए आदिवासी समुदाय ( tribal communities ) में बच्चों को गिरवी ( Pledged children ) रख दिया जाता है। बारां, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, कुशलगढ़ व मध्यप्रदेश के धार, झाबुआ, अली राजपुर इलाके में आदिवासी समाज में यह अजब रवायत आज भी है। सालभर की मजदूरी के नाम पर 30 से 40 हजार रुपए में रैबारी इन बच्चों को भेड़ और ऊंट चराने का काम देतेे हैं।
बारां के शाहाबाद उपखंड मुख्यालय के भील समाज के गांव आनासागर, रानीपुरा, हाड़ोता, उचावत, मंगलपुरा,खूंटी, बलारपुर, आदि गांवों के 50 से ज्यादा बच्चे रेबारियों के पास गिरवी हैं। जगह-जगह भेड़ निष्क्रमण के दौरान रेवड़ के साथ यह बच्चे सहज दिख जाते हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि चाइल्ड लाइन और मानव तस्करी यूनिट इस गोरखधंधे को जान कर भी अनजान बनी हुई हैं।
Read More: दुल्हन अपहरण केस: पिता की मौत के बाद कोटा में मचा बवाल, अंतिम संस्कार नहीं करने की चेतावनी से हिला पुलिस-प्रशासन
दो भाइयों को 30 हजार में गिरवी रखा
शाहाबाद उपखंड के एक गांव के शामू और रमेश के पिता की 3-4 वर्ष पहले बीमारी से मौत हो गई। मां नाते चली गई। चाचा की हैसियत इन्हें पालने की थी नहीं, सो उसने दोनों भाइयों को रेबारियों को 30 हजार रुपए साल में गिरवी रख दिया। दोनों दो वर्ष से रेबारियों के साथ भेड़ें चराते हैं।
Read More: दुल्हन अपहरण केस: आंदोलनकारियों ने सड़क पर शव रख सीएडी सर्किल किया जाम, सरकारी नौकरी और 10 लाख मुआवजे पर अड़े
पत्नी का अंतिम संस्कार करने के लिए बेटे को गिरवी रखा
शाहाबाद इलाके के एक गांव में दो वर्ष पहले दीन्या की पत्नी की मौत हुई। क्रियाकर्म और अन्य कामों पर 30 हजार रुपए खर्च हो गए। इतने रुपयों की व्यवस्था कैसे होती सो दीन्या ने अपने 14 वर्ष के बेटे को भेड़ें चराने के लिए गिरवी रख दिया। उसका बेटा अभी भी रेबारियों के साथ है।