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चीफ जस्टिस महाभियोग के मामले में प्रशांत भूषण का इंटरव्यू
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चीफ जस्टिस महाभियोग के मामले में प्रशांत भूषण का इंटरव्यू

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण के मुताबिक देश के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव को खारिज करना गैर संवैधानिक
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Mukesh Kumar Kejariwal

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Apr 23, 2018

प्रश्न- उप राष्ट्रपति ने कहा है कि महाभियोग प्रस्ताव में लगाए आरोप काल्पनिक हैं।

बिल्कुल नहीं। पांच गंभीर और स्पष्ट आरोप हैं। पहला उनके खिलाफ मेडिकल कॉलेज केस में घूस लेने का है। दूसरा पद के दुरुपयोग का है जिसमें अपने ही केस की सुनवाई खुद कर ली। तीसरा आरोप है झूठा शपथपत्र देने का है जो कृषि भूमि पाने के लिए दिया। चौथा है पिछली तारीख में मेमो दे कर फर्जीवाड़ा करने का। पांचवां है विभिन्न मामलों में मास्टर ऑफ रोस्टर के पॉवर के दुरुपयोग का।

प्रश्न- फिर भी देश के उप राष्ट्रपति कह रहे हैं कि यह बिल्कुल काल्पनिक हैं, तो इसकी क्या वजह लगती है?

वजह बिल्कुल साफ है। पूरी सरकार और भाजपा मुख्य न्यायाधीश को बचाने में लगी है, क्योंकि वे उनका ही काम कर रहे हैं। आरोपों में से एक यही है कि जिन राजनीतिक संवेदनशील मामलों को सरकार निपटाना चाहती है उनको वे एक खास जूनियर जजों की बेंच को भेज देते हैं। चार वरिष्ठ जजों ने भी सार्वजनिक तौर पर कहा है कि वे अपने मास्टर ऑफ रोस्टर के पद का दुरुपयोग कर रहे हैं।

वैसे भी उप राष्ट्रपति की भूमिका इसमें सिर्फ यह देखने की है कि 50 सांसदों ने दस्तखत किए हैं या नहीं और आरोप कदाचार का है या नहीं। आरोपों की जांच उन्हें करनी नहीं होती। यह काम जांच समिति को करना था।

प्रश्न- नायडू ने यह भी कहा है कि इस प्रस्ताव से लोगों में न्यायपालिका के प्रति विश्वसनीयता कम होने का डर है।

जब भी किसी भी जज के खिलाफ कोई आरोप लगता है तो विश्वास तो घटता ही है। लेकिन फिर तो कोई भी जज कितना भी कदाचार करे, उसके खिलाफ कभी महाभियोग लाया ही नहीं जाए।

प्रश्न- मास्टर ऑफ रोस्टर को ले कर तो सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ चुका है…

लेकिन आप अपने केस से खुद तो डील नहीं कर सकते। मेडिकल कॉलेज में घुसखोरी का जो मामला सीधे उनसे जुड़ा था, उन्होंने खुद ही सुना और तय कर दिया।

प्रश्न- आरोप है कि विपक्ष एक खास मामले में मन मुताबिक फैसला चाहता था। नहीं आया तो अविश्वास प्रस्ताव ला कर न्यायपालिका पर दबाव बना रहा है।

यह मामला तो बहुत दिनों से चल रहा था। मेडिकल कॉलेज मामला है, जज लोया मामला है। चार जजों ने प्रेस कांफ्रेंस की लेकिन कुछ नहीं हुआ। मैंने इनहाउस जांच की मांग की। अब क्या रह जाता है?

भय तो यह है कि मेडिकल कॉलेज की जांच में सीबीआआई ने इतने साक्ष्य जमा कर लिए हैं जो मुख्य न्यायाधीस को चार्जशीट करने के लिए पर्याप्त हैं। ऐसा भय है कि इसके आधार पर सरकार मुख्य न्यायाधीश को ब्लैकमेल कर सकती है। जाहिर है कि ऐसी स्थिति हो तो लोकतंत्र खतरे में आ जाएगा।

प्रश्न- लेकिन उप राष्ट्रपति का भी संवैधानिक पद है और उनका कहना है कि विभिन्न संवैधानिक विशेषज्ञों और संपादकों की लगभग एक राय है कि अविश्वास प्रस्ताव उपयुक्त नहीं।

बहुत से लोगों की यह राय हो सकती है। खास तौर पर वकीलों की जो इन्हीं जजों के सामने प्रैक्टिस करते हैं। इसी तरह जजों को भी लगता है कि यह ठीक नहीं। महाभियोग तो स्वभाविक ही राजनीतिक प्रक्रिया है, क्योंकि उसे शुरू करने के लिए ही सांसदों के दस्तखत चाहिए होते हैं। इसी तरह यह आखिर में भी दोनों सदनों में जाता है। कई लोगों को तो लगता है कि लाना ही नहीं चाहिए। लेकिन सवाल है कि जितने उपाय थे वे सभी आजमा लिए गए। लोकतंत्र खतरे में है। ऐसे में क्या किया जाए।

प्रश्न- अब आगे का क्या रास्ता बचता है?

यह आदेश बिल्कुल गैर संवैधानिक और गैर कानूनी है और गलत नीयत से लाया गया है। इसको तो जाहिर है कि चुनौती दी ही जाएगी सुप्रीम कोर्ट में।

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