
वाराणसी. महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ का इतिहास अनोखा है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने यहां पर खुद सूत काता था और एक सप्ताह तक रह कर देश को आजाद करने की रणनीति बनायी थी। स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में भी काशी विद्यापीठ की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
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काशी विद्यापीठ की स्थापना 10 फरवरी 1921 को हुई है। राष्ट्ररत्न शिवप्रसाद गुप्त ने महात्मा गांधी से प्रेरणा लेकर ही परिसर की स्थापना की थी। राष्ट्ररत्न ने बिना किसी से आर्थिक सहयोग लिए ही नैतिकता व देश की संस्कृति का ज्ञान देने के लिए एक विशाल परिसर की स्थापना की थी। आजादी की लड़ाई के समय कई क्रांतिकारियों ने काशी विद्यापीठ के छात्रावास में शरण पायी थी और समय-समय पर यही सें स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई का बिगुल भी बजाया जाता था।
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परिसर से जुड़े महापुरुषों की लम्बी है फेहरिस्त
काशी विद्यापीठ से जुड़े महापुरुषों की सूची बहुत लंबी है। राष्ट्ररत्न शिवप्रसाद गुप्ता व महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के अतिरिक्त नरेन्द्र देव, भगवानदास जी, डा.सम्पूर्णानंद आदि महापुरुष परिसर से जुड़े रहे। काशी विद्यापीठ का इतिहास प्राचीन होने के साथ गौरवशाली भी है।
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परिसर में अब लड़ी जा रही राष्ट्रीय महत्व संस्था की लड़ाई
काशी विद्यापीठ प्रशासन अब राष्ट्रीय महत्व की संस्था घोषित करने की लड़ाई लड़ रहा है। वर्षोे पूर्व नैक की टीम परिसर आयी थी और जब काशी विद्यापीठ के इतिहास की जानकारी हुई तो सदस्यों ने कहा था कि इस संस्था का इतना शानदार इतिहास है कि राष्ट्रीय महत्व की संस्था घोषित होनी चाहिए। काशी विद्यापीठ प्रशासन ने इस संदर्भ में केन्द्र व राज्य सरकार को भी प्रस्ताव भेजा है जिस पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।
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