
अयोध्या में रामलला अपने मंदिर में विराजमान हो गए। 14 साल वनवास में रहे भगवान राम कई स्थानों पर गए, आज वो स्थान तीर्थ बन चुके हैं। मध्यप्रदेश के विदिशा में एक ऐसा ही स्थान हैं, जहां वनवास के दौरान भगवान राम आए थे। यह दुर्लभ मंदिर ऐसा है जहां भगवान राम और लक्ष्मण के साथ विराजे हैं। इस मंदिर में सीतामाता की प्रतिमा नहीं हैं। भगवान राम और लक्ष्मण की प्रतिमा दाढ़ी-मूंछों में है।
patrika.com की मेरे नाम सीरिज में आज हम आपको बता रहे हैं वनवासी राम के मंदिर के बारे में...। यह ऐसा दुर्लभ मंदिर हैं जहां भगवान राम सीता के साथ नहीं लक्ष्मण के साथ स्थापित हैं। दाढ़ी-मूंछों वाली यह प्रतिमाएं दुर्लभ हैं...।
वाल्मीकि रामायण में भी इस स्थान का उल्लेख मिलता है। इतिहासकारों के मुताबिक वाल्मीकि भी बिहार के चंपारण के बाद विदिशा में बस गए थे और यहीं पर उन्हें ज्ञान भक्ति प्राप्त हुई थी। विदिशा की बेतवा नदी के तट पर बने चरण चिन्ह और वनवासी राम का मंदिर इस गाथा को अवश्य सिद्ध करते हैं।
विदिशा में चरणतीर्थ मंदिर के पास ही त्रिवेणी घाट से लगा एक करीब एक हजार साल पुराना स्थान है। यहां एक टीले के नीचे से स्वप्न देकर दो प्रतिमाएं निकलने की मान्यता है। काले पत्थर और वनवासी वेष में राम-लक्ष्मण की मूंछधारी प्रतिमाएं हैं। भगवान राम की ऐसी प्रतिमा दुर्लभ है। जो कहीं देखने को नहीं मिलती है।
मंदिर के पुजारी पं. गोविंद शर्मा बताते हैं कि उनकी आठवीं पीढ़ी यहां भगवान की सेवा में है। वे कहते हैं कि प्रतिमाओं की स्थापना का ठीक-ठीक समय किसी को ज्ञात नहीं, लेकिन यह तय है कि प्रतिमाएं जमीन में से निकलीं थीं और फिर मंदिर बाद में बनाया गया। बाद में जीर्णोद्धार भी हुआ। यहां भगवान राम-लक्ष्मण वनवासी के वेष में हैं। उनके सिर पर जटा मुकुट है और चेहरे पर मूंछें हैं। ऐसी प्रतिमा दुर्लभ है। यह क्षेत्र का ऐसा एकमात्र मंदिर है, जहां भगवान राम जानकीजी के साथ नहीं, बल्कि अपने अनुज लक्ष्मण के साथ विराजमान हैं। लेकिन, इस मंदिर के बारे में बहुत से लोगों को जानकारी नहीं है। इस कारण बहुत कम लोग यहां दर्शन के लिए आ पाते हैं। खेतों के बीच बने रास्ते से होकर यहां पहुंचते हैं।
राम-लक्ष्मण की प्रतिमाएं
बेतवा नदी के चरण तीर्थ के पास ही यह मंदिर भी स्थित है। इस मंदिर को वनवासी राम के नाम से जाना जाता है। बेतवा नदी के तट पर खुदाई में ही यह दोनों प्रतिमाएं मिली थीं। इसमें श्रीराम और लक्ष्मण की वनवासी के वेष में हैं। इतिहासकारों के मुताबिक सीताजी की खोज में जब भगवान राम आए थे तब से ही यह प्रतिमाएं रहीं होंगी।
यह भी हैं मान्यताएं
इतिहास के जानकार कहते हैं कि विदिशा में भगवान राम के दो स्थानों की मान्यता है। एक चरण तीर्थ, दूसरा त्रिवेणी मंदिर, जहां भगवान राम-लक्ष्मण का मंदिर है। चरण तीर्थ मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यहां भगवान राम आए थे। एक बार तो यहां के सरोवर में स्नान कर ब्रह्म हत्या का दोष मिटाया था। दूसरी बार के बारे में कहा जाता है कि भगवान राम के छोटे भाई शत्रुघ्न के बेटे शत्रुघाती के राज्याभिषेक में आए थे। तब शत्रुघाती की राजधानी विदिशा हुआ करती थी। भगवान राम अयोध्या से पुष्कर भी इसी रास्ते से गुजरे थे। यह भी मान्यता है कि विदिशा को पूरे दक्षिण भारत का द्वार कहा जाता था। जब भगवान विदिशा से गुजरे थे तो उन्हें च्यवन ऋषि के आश्रम के बारे में बताया गया तो भगवान उनसे मिलने आए थे। यहीं स्थान चरणतीर्थ कहलाता है। इसी स्थान के पास छोटी-सी पहाड़ी के पीछे दो नदियों का संगम है। जहां बैस और बेतवा नदी मिलती है। इसी स्थान पर राम लक्ष्मण मंदिर है।
कब मिलीं थी प्रतिमाएं
माना जाता है कि यहां भगवान राम और लक्ष्मण की प्रतिमाएं 200 साल पहले बेतवा की खुदाई में मिली थीं। मंदिर भी इतना ही प्राचीन है। मान्यताएं हैं कि यह पूरा क्षेत्र वैदिक नगर था। प्राचीन बस्ती थी, जो पांचवी, छठवीं शताब्दी विद्यमान थी। पांचवीं शताब्दी के आसपास कोई बहुत बड़ा अथवा तो जल प्रभाव अथवा कोई बाढ़ अथवा कोई अग्निकांड ऐसा हुआ होगा कि पूरा वैदिक नगर तबाह हो गया था। उसके बाद पांचवी, छठवीं शताब्दी से ऐतिहासिक ग्रंथ इसकी पुष्टि भी करते हैं।
भोपाल से विदिशा (bhopal to vidisha distance)
प्राचीन शहर विदिशा भोपाल से 57 किलोमीटर दूर है। यहां पहुंचने में करीब डेढ़ घंटे का समय लगता है। देश के कई हिस्सों से भोपाल तक पहुंचने के लिए सीधी फ्लाइट है। आप राजाभोज एयरपोर्ट पर लैंड करने के बाद सड़क मार्ग से विदिशा पहुंच सकते हैं। इसके अलावा दिल्ली मुंबई रेलवे ट्रैक पर स्थित विदिशा में रेलवे स्टेशन भी हैं। वहीं यहां पहुंचने के लिए कई शहरों से बसें भी चलती हैं।
Updated on:
23 Jan 2024 01:18 pm
Published on:
23 Jan 2024 12:02 pm
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