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Explainer: PM मोदी और ईरानी राष्ट्रपति की मुलाकात के बाद क्या है चाबहार का अगला कदम?

India Iran Relations: भारत-ईरान संबंधों में चाबहार बंदरगाह, अमेरिकी प्रतिबंध, समुद्री सुरक्षा और ऊर्जा सहयोग की क्या भूमिका है? जानिए दोनों देशों के रिश्तों के नए समीकरण क्या कहते हैं!
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Sanjana Kumar

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Updated: 28 Oct 2026, 4:00 PM IST

India Iran Relations New Friendship

India Iran Relations New Friendship: AI Creative

भारत-ईरान: चाबहार से समुद्री सुरक्षा तक नई चाल

India Iran Relations: भारत और ईरान के रिश्तों में इन दिनों कूटनीति, व्यापार और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े नए पहलू सामने आ रहे हैं। दोनों देश अपने पुराने संबंधों को आगे बढ़ाने के साथ पश्चिम एशिया में शांति, समुद्री व्यापार और आर्थिक सहयोग जैसे मुद्दों पर भी बातचीत कर रहे हैं। ऐसे समय में चाबहार बंदरगाह भारत-ईरान संबंधों का अहम केंद्र बना हुआ है।

11 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन की मुलाकात हुई। दोनों नेताओं की यह दो सप्ताह से भी कम समय में दूसरी मुलाकात थी। इससे पहले 31 अगस्त को बिश्केक में SCO शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों की बातचीत हुई थी।

नई दिल्ली में हुई बैठक में दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों और पश्चिम एशिया के हालात पर विचार साझा किए। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि सभी विवादों का समाधान बातचीत और कूटनीति से होना चाहिए। उन्होंने क्षेत्र में स्थायी शांति और स्थिरता बनाए रखने के साथ समुद्री रास्तों से व्यापार जारी रखने और नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया।

चाबहार बंदरगाह पर भारत को ईरान का न्योता

भारत और ईरान के संबंधों में चाबहार बंदरगाह की भूमिका खास है। सितंबर में प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात के बाद ईरानी राष्ट्रपति पेजेश्कियन ने भारत को इस बंदरगाह में निवेश बढ़ाने और दोनों देशों के बीच व्यापारिक सहयोग मजबूत करने का न्योता दिया। उन्होंने कहा कि भारत पहले से ही इस परियोजना में निवेश कर रहा है और आगे भी साझेदारी के नए अवसर तलाशे जा सकते हैं।

यह प्रस्ताव ऐसे समय आया है, जब चाबहार परियोजना में भारत की भागीदारी अमेरिकी प्रतिबंधों से जुड़ी परिस्थितियों के कारण चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। भारत को मिली सशर्त प्रतिबंध छूट 26 अप्रैल 2026 को समाप्त हो गई थी। इसके बाद भारत ने ईरान और अमेरिका सहित संबंधित पक्षों के साथ बातचीत जारी रखने की बात कही।

चाबहार बंदरगाह ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित है। यह भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया के देशों तक पहुंच बनाने में मदद कर सकता है। इसके जरिए भारत को पाकिस्तान से होकर गुजरे बिना क्षेत्रीय व्यापार और संपर्क बढ़ाने का अवसर मिलता है।

भारत के लिए चाबहार का मुख्य महत्व क्या

यह बंदरगाह चीन की मदद से विकसित पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह के संदर्भ में भी रणनीतिक महत्व रखता है। हालांकि, चाबहार और ग्वादर की भूमिका को केवल एक-दूसरे के मुकाबले के रूप में देखना सही नहीं होगा। भारत के लिए चाबहार का मुख्य महत्व क्षेत्रीय संपर्क, व्यापार और वैकल्पिक मार्गों को मजबूत करना है।

भारत ने चाबहार के शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल को विकसित करने और संचालित करने के लिए ईरान के साथ मई 2024 में 10 साल का समझौता किया था। भारत ने बंदरगाह के उपकरणों की खरीद के लिए 12 करोड़ डॉलर के अपने निवेश की प्रतिबद्धता पूरी कर दी है। अब अमेरिकी प्रतिबंधों से जुड़ी परिस्थितियों के बीच परियोजना का संचालन और आगे का सहयोग महत्वपूर्ण सवाल हैं।

अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच भारत की चुनौती

चाबहार बंदरगाह भारत की क्षेत्रीय संपर्क योजना का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण यहां काम करना आसान नहीं है। भारत को अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों के साथ अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से जुड़े जोखिमों का भी ध्यान रखना पड़ता है।

मार्च 2026 में सरकार ने संसद में बताया था कि चाबहार परियोजना के लिए भारत अपनी 12 करोड़ डॉलर की वित्तीय प्रतिबद्धता पूरी कर चुका है। इसके बाद परियोजना के लिए सरकार की ओर से कोई अतिरिक्त वित्तीय प्रतिबद्धता शेष नहीं थी। वहीं, अप्रैल में प्रतिबंधों से जुड़ी छूट समाप्त होने के बाद भारत ने कहा कि इस विषय पर अमेरिका और अन्य संबंधित पक्षों के साथ बातचीत जारी है।

इस स्थिति में भारत के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर वह ईरान के साथ लंबे समय से चले आ रहे संबंधों को बनाए रखना चाहता है, वहीं दूसरी ओर अपने व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक हितों को भी सुरक्षित रखना चाहता है।

होर्मुज जलडमरूमध्य और समुद्री सुरक्षा क्यों अहम?

भारत-ईरान संबंधों का एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू समुद्री सुरक्षा है। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के प्रमुख समुद्री मार्गों में शामिल है। यहां से तेल और अन्य जरूरी वस्तुओं की बड़ी मात्रा का परिवहन होता है। इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है।

अप्रैल 2026 में होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास भारतीय ध्वज वाले जहाजों पर गोलीबारी की घटनाओं को लेकर भारत ने ईरान के सामने चिंता जताई थी। भारत ने जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने की मांग भी की। इस पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री मोदी का समुद्री व्यापार की स्वतंत्रता और नाविकों की सुरक्षा पर जोर देना महत्वपूर्ण है।

भारत के लिए यह केवल कूटनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि उसकी ऊर्जा जरूरतों और समुद्री व्यापार से जुड़ा सवाल भी है। इसलिए भारत पश्चिम एशिया में तनाव कम करने और विवादों का समाधान बातचीत से निकालने की वकालत करता रहा है।

ईरानी नौसेना के जहाज को मानवीय मदद

भारत और ईरान के संबंधों में मानवीय सहयोग का पहलू भी सामने आया है। मार्च 2026 में ईरानी नौसेना के जहाज IRIS Lavan को भारत में आपात स्थिति में डॉकिंग की अनुमति दिए जाने और उसके चालक दल को सहायता उपलब्ध कराने का मामला इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है।

यह घटनाक्रम बताता है कि क्षेत्रीय तनाव के बीच भी मानवीय जरूरतों और समुद्री सुरक्षा से जुड़े मामलों में सहयोग की गुंजाइश बनी रहती है। हालांकि, इस घटना को दोनों देशों के बीच व्यापक रणनीतिक सहमति का प्रमाण मानने के बजाय मानवीय सहयोग के एक उदाहरण के रूप में देखना उचित होगा।

रूस-ईरान पर अमेरिकी कानून और भारत की ऊर्जा नीति

भारत के सामने एक और चुनौती अमेरिका के रूस और ईरान से जुड़े प्रतिबंधों का प्रभाव है। सितंबर 2026 में अमेरिकी कांग्रेस से पारित Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 पर भारत ने कहा कि वह आगे के घटनाक्रम पर नजर रख रहा है।

भारत के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि देश की ऊर्जा सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकताओं में है। इसके लिए भारत अलग-अलग स्रोतों से ऊर्जा हासिल करने और बाजार की बदलती परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने की नीति पर आगे बढ़ेगा। सरकार ने यह भी कहा कि भारत अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाएगा।

इससे स्पष्ट होता है कि भारत किसी एक देश पर ऊर्जा जरूरतों के लिए निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग विकल्प बनाए रखना चाहता है। ईरान के साथ संबंधों को आगे बढ़ाते हुए भी भारत को अमेरिका के साथ अपने संबंधों और व्यापक वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों का ध्यान रखना होगा।

भारत-ईरान संबंधों का आगे का रास्ता

भारत और ईरान के रिश्ते अब केवल तेल, ऊर्जा या बंदरगाह तक सीमित नहीं हैं। इनमें क्षेत्रीय संपर्क, समुद्री सुरक्षा, व्यापार, कूटनीति और बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग जैसे कई मुद्दे शामिल हैं।

BRICS जैसे मंच दोनों देशों को विकासशील देशों के हितों, व्यापार और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर विचार साझा करने का अवसर देते हैं। हालांकि, दोनों देशों के बीच संबंधों की वास्तविक प्रगति इस बात पर निर्भर करेगी कि चाबहार परियोजना, प्रतिबंधों से जुड़ी चुनौतियों और समुद्री सुरक्षा जैसे मुद्दों पर आगे कितनी ठोस प्रगति होती है।

भारत के लिए चुनौती ईरान के साथ ऐतिहासिक संबंधों को बनाए रखते हुए अपनी ऊर्जा जरूरतों, व्यापारिक हितों और अन्य अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों के बीच संतुलन कायम करना है। आने वाले समय में चाबहार बंदरगाह पर सहयोग और पश्चिम एशिया में शांति के प्रयास यह तय करने में अहम होंगे कि भारत-ईरान साझेदारी किस दिशा में आगे बढ़ती है।