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Explainer: वोटर लिस्ट पर ट्रम्प प्रशासन को अदालतों से झटका, राज्यों से मांगी थी मतदाताओं की निजी जानकारी

Trump Voter Data: मतदाता सूची की मांग पर अदालतों का बड़ा फैसला, जानिए 30 राज्यों के खिलाफ DOJ के मुकदमे, निजता का सवाल और 27 मामलों में प्रशासन को मिली हार।
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Sanjana Kumar

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Updated: 30 Oct 2026, 10:51 AM IST

Trump Voter Data

Trump Voter Data: फोटो सोर्स: ANI

वोटर की जानकारी मांगी, अदालतों ने कहा नहीं दे सकते

Trump Voter Data: अमेरिका में ट्रम्प प्रशासन का राज्यों से मतदाताओं की निजी जानकारी मांगने का प्रयास एक जटिल और संवेदनशील मामला बन गया है, जो चुनावी पारदर्शिता, निजता के अधिकार और संघीय बनाम राज्य शक्तियों के बीच संतुलन से जुड़ा है। अब तक ज्यादातर अदालतें प्रशासन के खिलाफ फैसला दे चुकी हैं। नीचे इस विषय को विस्तार से समझाया गया है।

यहां समझिए पूरी कहानी

अमेरिकी न्याय विभाग यानी DOJ ने पिछले करीब एक साल में अधिकांश राज्यों और वाशिंगटन डी सी से मतदाता पंजीकरण की पूरी और बिना काटछांट वाली सूची मांगी। इसमें नाम, पता, जन्मतिथि, ड्राइविंग लाइसेंस नंबर और सोशल सिक्योरिटी नंबर का पूरा या आंशिक हिस्सा जैसी संवेदनशील जानकारी शामिल है।

रिपोर्टों के मुताबिक कम से कम 18 राज्यों ने यह जानकारी दे दी। जिन राज्यों ने इनकार किया, उनमें से 30 राज्यों और डी सी के खिलाफ DOJ ने कुल 31 मुकदमे दायर किए।

वोटर लिस्ट में कौन कौन सी जानकारी होती है

अधिकांश राज्यों में वोटर रजिस्ट्रेशन के दौरान नाम, पता, जन्मतिथि, ड्राइविंग लाइसेंस नंबर और सोशल सिक्योरिटी नंबर का आंशिक हिस्सा लिया जाता है। हालांकि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध वोटर लिस्ट में आमतौर पर ये संवेदनशील जानकारियां नहीं होतीं। कई राज्यों में यह जानकारी केवल चुनाव अधिकारियों तक ही सीमित रहती है।

ट्रम्प प्रशासन की दलील क्या है

प्रशासन का कहना है कि राज्य वोटर लिस्ट की सफाई ठीक से नहीं कर रहे और यह जानकारी इसलिए जरूरी है ताकि सूची में गैर नागरिक शामिल न रहें। DOJ का तर्क है कि सिविल राइट्स एक्ट 1960, नेशनल वोटर रजिस्ट्रेशन एक्ट और हेल्प अमेरिका वोट एक्ट जैसे संघीय कानून उसे यह अधिकार देते हैं।

DOJ ने यह भी बताया कि वह इस डेटा का मिलान गृह सुरक्षा विभाग यानी DHS के SAVE सिस्टम से करेगा, जिससे नागरिकता की जांच होती है। हालांकि रिपोर्टों में कहा गया है कि प्रशासन को अब तक व्यापक वोटर फ्रॉड के सबूत नहीं मिले हैं।

राज्यों और अदालतों की प्रतिक्रिया

अधिकांश राज्यों ने संवैधानिक और निजता कानूनों का हवाला देते हुए जानकारी देने से इनकार कर दिया। अब तक अदालतों ने DOJ के 27 मुकदमे खारिज कर दिए हैं।

ओक्लाहोमा के साथ समझौता हुआ और नेब्रास्का का मामला इसलिए खत्म हुआ क्योंकि राज्य ने मुकदमे के दौरान डेटा सौंप दिया। कुछ मामले अब भी लंबित हैं। मिशिगन के मामले में अपील अदालत यानी छठे सर्किट ने भी DOJ के खिलाफ फैसला दिया।

खास बात यह है कि फैसले केवल डेमोक्रेट शासित राज्यों में नहीं आए। कई रिपब्लिकन राष्ट्रपतियों के नियुक्त जजों ने भी DOJ की मांग ठुकराई। यूटा में ट्रम्प द्वारा नियुक्त जज डेविड बार्लो ने मामला दोबारा दायर न हो सकने की शर्त के साथ खारिज किया।

कोलोराडो में जज ने कहा कि DOJ ने जरूरत का पर्याप्त कारण नहीं बताया और बिना काटछांट वाली वोटर लिस्ट उन रिकॉर्ड में नहीं आती जिन पर विभाग का अधिकार बनता है।

9 अक्टूबर का बड़ा फैसला

9 अक्टूबर 2026 को वाशिंगटन की संघीय जज स्पार्कल सूकनानन ने DOJ की वोटर लिस्ट मेंटेनेंस नीति को रद्द कर दिया। यह मामला नागरिक अधिकार संगठन कॉमन कॉज की याचिका पर था।

जज ने कहा कि DOJ ने अपने कानूनी अधिकार से बाहर जाकर काम किया और निजता कानून का उल्लंघन किया। उन्होंने यह भी कहा कि SAVE सिस्टम में गलतियां होती हैं और वह कई बार असली नागरिकों को भी गैर नागरिक बता देता है। DOJ ने कहा है कि वह फैसले की समीक्षा कर रहा है।

निजता और संवेदनशीलता की चिंताएं

सोशल सिक्योरिटी नंबर और ड्राइविंग लाइसेंस नंबर जैसी जानकारी पहचान की चोरी और दुरुपयोग का जोखिम पैदा कर सकती है। प्राइवेसी एक्ट और ड्राइवर्स प्राइवेसी प्रोटेक्शन एक्ट जैसे संघीय कानून इसी तरह की जानकारी की सुरक्षा के लिए बनाए गए हैं। कई राज्यों के अपने कानून भी चुनाव अधिकारियों के अलावा किसी और को ऐसी जानकारी देने से रोकते हैं।

चुनावी पारदर्शिता बनाम निजता का संतुलन

चुनावों में पारदर्शिता जरूरी है, लेकिन यह तभी संभव है जब मतदाताओं की संवेदनशील जानकारी सुरक्षित रहे। प्रशासन का तर्क है कि यह डेटा चुनाव की शुद्धता के लिए जरूरी है।

वहीं अदालतों और राज्य अधिकारियों का मानना है कि यह राज्यों के चुनाव कराने के अधिकार में दखल है और इससे मतदाताओं की निजता खतरे में पड़ सकती है। मध्यावधि चुनाव अगले हफ्ते यानी 3 नवंबर को हैं, इसलिए यह बहस और तेज हो गई है।

भारत और आप पर असर

हालांकि यह मामला अमेरिका का है, लेकिन यह भारत जैसे लोकतंत्रों को भी चुनावी पारदर्शिता और डेटा संरक्षण के बीच संतुलन की याद दिलाता है। भविष्य में कभी ऐसी मांगें उठती हैं, तो यह देखना होगा कि निजता कानून मजबूत हों और चुनावी प्रक्रिया भी सुरक्षित रहे।

अब आगे क्या?

DOJ के पास अपील का रास्ता खुला है। कैलिफोर्निया और ओरेगॉन के मामलों की अपील नौवें सर्किट में लंबित है। अगर मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचता है, तो यह संघीय बनाम राज्य अधिकारों और निजता की सीमा तय कर सकता है।

कुल मिलाकर यह मामला चुनावी पारदर्शिता और निजता के बीच संवेदनशील टकराव को उजागर करता है। लोकतंत्र में पारदर्शिता जरूरी है, लेकिन वह तभी सुरक्षित रहती है जब नागरिकों की व्यक्तिगत जानकारी का सम्मान और सुरक्षा हो।