
डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग। (फोटो : ANI)
चीन ताइवान पर जबरन कब्जा करने की तैयारी में है, इसके लिए वह ताइवान के आसपास इलाकों में सैन्य अभ्यास तेज कर रहा है। हालांकि, जबरन कब्जे की भनक लगते ही ताइवान के लिए अमेरिका आगे खड़ा हो गया है।
इस बीच, ताइवान के मंत्री चिउ चुई-चेंग ने साफ कहा है कि चीन ताइवान की आजादी मिटाकर उसे जबरन अपने में मिलाना चाहता है। बीजिंग की बढ़ती सैन्य धमकियों और चालबाजियों से पूरा इलाका अस्थिर हो रहा है।
मंत्री चिउ ने एक इंटरव्यू में बताया कि चीन लगातार ताइवान के आसपास सैन्य अभ्यास बढ़ा रहा है। ग्रे जोन टैक्टिक्स का इस्तेमाल कर वो ताइवान पर दबाव बना रहा है। लेकिन दुनिया के सामने ताइवान को ही दोषी ठहरा रहा है।
उनका कहना है कि बीजिंग का असली मकसद ताइवान की संप्रभुता खत्म करना और उसे चीनी शासन स्वीकार करने के लिए मजबूर करना है।
इस बीच, मंत्री ने अमेरिका की तारीफ की। उन्होंने कहा कि अमेरिका ताइवान और पूरे क्षेत्र की स्थिरता के लिए लगातार साथ दे रहा है।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और विदेश मंत्री मार्को रुबियो के बयानों का जिक्र करते हुए चिउ ने कहा कि चीन के साथ हालिया बातचीत के बावजूद वाशिंगटन की ताइवान नीति नहीं बदली है।
उन्होंने कहा कि अमेरिका से हथियार खरीदना ताइवान के लिए बहुत जरूरी है। इससे चीन की धमकियों का मुकाबला करने में मदद मिलती है।
अमेरिका की पुरानी नीति 'स्ट्रेटेजिक अम्बिग्युटी' के तहत वो ये साफ नहीं करता कि चीन के हमले पर वो सीधे हस्तक्षेप करेगा या नहीं, लेकिन हथियार सप्लाई जारी रखना शांति बनाए रखने के लिए अहम है।
चीन की बढ़ती सैन्य ताकत को देखते हुए पहली द्वीप श्रृंखला के देश अपनी सुरक्षा मजबूत कर रहे हैं। ताइवान भी लोकतंत्र, स्वतंत्रता और क्षेत्रीय शांति की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। मंत्री ने जोर देकर कहा कि मौजूदा स्थिति को बनाए रखना ताइवान की आजादी की मांग नहीं है, बल्कि शांति बनाए रखने का रास्ता है।
चिउ ने आरोप लगाया कि चीन ने 'ताइवान इंडिपेंडेंस' की परिभाषा बहुत चौड़ी कर दी है। अब ताइवान का कोई भी रक्षा सौदा, विदेश नीति का कदम या चीन के प्रभाव से बचने का प्रयास उसे 'स्वतंत्रता' मान लिया जाता है। इससे ताइवान के सामान्य कामकाज पर भी दबाव पड़ रहा है।
मंत्री चिउ ने ताइवान की मुख्य विपक्षी पार्टी चाइनीज नेशनलिस्ट पार्टी पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि रक्षा बजट पास करने में देरी से देश की सुरक्षा कमजोर होती है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ताइवान के प्रति विश्वास घटता है। अगर कोई राजनीतिक ताकत बीजिंग की भाषा बोलती है तो वो अनजाने में चीन की 'युनाइटेड फ्रंट' रणनीति का हिस्सा बन जाती है।
Published on:
23 May 2026 08:33 pm
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