1 मई 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

हॉर्मुज और तेल संकट में कौन अपना? भारत ने निभाई दोस्ती, पर चीन के रवैये ने दुनिया भर का तोड़ा भरोसा!

हॉर्मुज संकट के बीच भारत और चीन के रवैये में बड़ा अंतर सामने आया। भारत ने बिना शर्त पड़ोसियों की मदद की, जबकि चीन ने सियासी फायदे की कोशिश की।

2 min read
Google source verification

भारत

image

Mukul Kumar

May 01, 2026

Indian Prime Minister Narendra Modi and Chinese President Xi Jinping

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग। (फोटो- ANI)

मिडिल ईस्ट में चल रहे तनाव और हॉर्मुज स्ट्रेट के बंद होने से पैदा हुए तेल संकट ने सिर्फ अर्थव्यवस्था ही नहीं, बल्कि पड़ोसी देशों के रिश्तों की असली तस्वीर भी सामने रख दी है। इस मुश्किल समय में एशिया के दो बड़े देश भारत और चीन ने अपने पड़ोसियों के साथ बिल्कुल अलग-अलग रवैया अपनाया है।

जब कई देशों को ईंधन की कमी का सामना करना पड़ा, तब भारत ने बिना किसी शर्त के अपने पड़ोसियों की मदद की। श्रीलंका को करीब 38,000 मीट्रिक टन ईंधन भेजा गया, जिससे वहां की तत्काल जरूरतों को काफी हद तक पूरा किया जा सका।

नेपाल-भूटान की भी भारत ने की मदद

नेपाल और भूटान, जो पूरी तरह भारत पर निर्भर हैं, वहां ईंधन की सप्लाई बिना किसी रुकावट के जारी रही। बांग्लादेश को भी अतिरिक्त डीजल दिया गया और पाइपलाइन के जरिए आगे भी आपूर्ति का भरोसा दिलाया गया।

भारत का यह कदम अचानक लिया गया फैसला नहीं था, बल्कि उसकी ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति का हिस्सा है, जिसमें पड़ोसी देशों की मदद को प्राथमिकता दी जाती है।

चीन का रुख, मदद के साथ शर्तें

दूसरी ओर, चीन का रवैया काफी अलग नजर आया। जैसे ही संकट गहराया, चीन ने अपने ईंधन निर्यात को सीमित करना शुरू कर दिया। नए कॉन्ट्रैक्ट रोक दिए गए और कई पुराने समझौतों को भी रद्द करने की कोशिश की गई।

इसका असर ऑस्ट्रेलिया, बांग्लादेश और फिलीपींस जैसे देशों पर पड़ा जो चीन से तेल आयात पर निर्भर थे। ये देश अचानक मुश्किल में फंस गए और उन्हें वैकल्पिक व्यवस्था खोजनी पड़ी।

ताइवान को ऑफर, पर शर्त के साथ

चीन ने इस संकट को अपने राजनीतिक फायदे के लिए भी इस्तेमाल करने की कोशिश की। उसने ताइवान को तेल सप्लाई का ऑफर दिया, लेकिन इसके साथ शर्त रखी कि ताइवान शांतिपूर्ण तरीके से चीन के साथ एकीकरण पर सहमत हो।

ताइवान ने इस प्रस्ताव को तुरंत खारिज कर दिया। इससे साफ हो गया कि चीन की मदद सिर्फ मदद नहीं, बल्कि दबाव बनाने का तरीका भी हो सकती है।

संकट को अवसर में बदलने की कोशिश

रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन के पास बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का भंडार है। इसके बावजूद उसने क्षेत्र में कमी को कम करने के बजाय उसे बढ़ने दिया। माना जा रहा है कि इससे उसे राजनीतिक और रणनीतिक फायदा मिल सकता था।

इस पूरे घटनाक्रम ने साफ कर दिया कि भारत और चीन अपने पड़ोसियों के साथ किस तरह का व्यवहार करते हैं। भारत ने जहां भरोसे और सहयोग पर जोर दिया, वहीं चीन ने मौके का फायदा उठाकर अपने हित साधने की कोशिश की।