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सिंधु जल संधि पर भारत का स्टैंड सही, जिनेवा में UNHRC सम्मेलन में गूंजी समर्थन की आवाज

Indus Waters Treaty: जिनेवा में UNHRC के 63वें सत्र के दौरान आयोजित कॉन्फ्रेंस में अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने सिंधु जल संधि रोकने के भारत के फैसले का समर्थन किया, सिंध-बलूचिस्तान के जल अधिकारों पर भी उठे सवाल।
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UNHRC 63rd session

UNHRC की साइडलाइन कॉन्फ्रेंस में सिंधु जल संधि पर भारत का समर्थन, Photo source@ChatGpt

Indus Waters Treaty: संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के 63वें सत्र के दौरान आयोजित एक कॉन्फ्रेंस में अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने सिंधु जल संधि (IWT) को फिलहाल रोके रखने के भारत के फैसले का समर्थन किया। वक्ताओं ने कहा कि इस मुद्दे पर सुरक्षा, मानवाधिकार और सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर समुदायों के जल अधिकारों के संदर्भ में विचार किया जाना चाहिए। भारतीय नागरिक समाज संगठन 'शिवि डेवलपमेंट सोसाइटी' (SDS) द्वारा आयोजित इस कॉन्फ्रेंस का शीर्षक था सामुदायिक जल अधिकार और सिंधु जल संधि को फिलहाल रोके रखने की आवश्यकता।

संधि की समीक्षा भारत का संप्रभु अधिकार

ब्रुसेल्स स्थित 'साउथ एशिया डेमोक्रेटिक फोरम' के अनुसंधान निदेशक डॉ. सीगफ्राइड ओ. वोल्फ ने कहा कि संधि की समीक्षा की मांग करना भारत का संप्रभु अधिकार है, और उनके आकलन के अनुसार पाकिस्तान के व्यवहार ने समझौते के "उद्देश्य, मकसद और भावना" को प्रभावित किया है। उन्होंने पानी के बंटवारे, सिंधु विकास कोष में भारत के वित्तीय योगदान, भंडारण-बुनियादी ढांचे से जुड़े प्रतिबंधों और बगलीहार, किशनगंगा व रातले परियोजनाओं पर कानूनी विवादों जैसी संरचनात्मक असमानताओं की ओर इशारा किया।

पश्चिमी नदियों को लेकर पाकिस्तान की चिंताओं को खारिज करते हुए उन्होंने भारत द्वारा नदी का बहाव "रोकने" के दावे को "इंजीनियरिंग मिथक" बताया, और पाकिस्तान की जल चुनौतियों के लिए कृषि पद्धतियों, भूमि स्वामित्व और पुरानी नहर प्रणालियों जैसे घरेलू कारकों को भी जिम्मेदार ठहराया।

सिर्फ द्विपक्षीय मामला नहीं

अध्यक्षता कर रहे SDS के कार्यकारी निदेशक नरेंद्र कुमार ने कहा कि IWT पर बहस भारत-पाकिस्तान रिश्तों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उन्होंने कहा, "सिंधु जल संधि को कुछ समय रोकने का सवाल सिर्फ़ द्विपक्षीय समझौते का मामला नहीं, बल्कि सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर स्थानीय समुदायों के अधिकारों और जायज ज़रूरतों को मान्यता देने का भी मामला है।" उन्होंने मानवाधिकार, समान जल-पहुंच और टिकाऊ प्रबंधन को चर्चा का केंद्र बनाने की बात कही।

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की चिंता

लंदन स्थित कार्यकर्ता आरिफ आजकिया ने पानी को मौलिक मानवाधिकार बताते हुए सिंध में जल-बंटवारे पर चिंता जताई और इसे भारत-पाकिस्तान सुरक्षा मुद्दों से जोड़ा। जिनेवा स्थित 'इंटरनेशनल फोरम फॉर सेक्युलर बांग्लादेश' के मामून रहमान ने सिंध और बलूचिस्तान के समुदायों की चिंताओं पर अधिक ध्यान देने की मांग की। वर्ल्ड सिंधी कांग्रेस के चेयरपर्सन लाखू लुवाना ने वीडियो बयान में कहा कि सिंध-बलूचिस्तान की चिंताएं किसी द्विपक्षीय संधि से आगे की हैं।