
ईरान से कारोबार करने वाले देशों को अमेरिका की सेकेंडरी सैंक्शंस की धमकी (प्रतीकात्मक फोटो - चैटजीपीटी)
US Secondary Sanctions Iran: ईरान पर अमेरिकी दबाव अब सिर्फ तेहरान तक सीमित नहीं है। अमेरिका ने ईरान के साथ कारोबार करने वाले देशों और कंपनियों को भी कार्रवाई की चेतावनी दी है। ट्रंप प्रशासन ने इसके लिए 'ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट' शुरू किया है। इसका मकसद ईरान की कमाई के स्रोतों और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संपर्कों को कमजोर करना है।
अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने कहा है कि जो देश या संस्थाएं ईरान के साथ कारोबार में मदद करेंगी, उन्हें भी अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे प्रतिबंधों को 'सेकेंडरी सैंक्शंस' कहा जाता है।
आमतौर पर किसी देश पर लगाए गए प्रतिबंध सीधे उसी देश की सरकार, कंपनियों या नागरिकों पर लागू होते हैं। लेकिन सेकेंडरी सैंक्शंस का दायरा इससे आगे जाता है। इसमें किसी प्रतिबंधित देश के साथ कारोबार करने वाली दूसरे देशों की कंपनियां, बैंक या व्यक्ति भी अमेरिकी कार्रवाई की जद में आ सकते हैं।
यानी अगर कोई विदेशी कंपनी ईरान के साथ ऐसा कारोबार करती है जिसे अमेरिका प्रतिबंधित मानता है तो उस कंपनी पर भी अमेरिका कार्रवाई कर सकता है। यही सेकेंडरी सैंक्शंस की सबसे बड़ी ताकत है।
अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत उसके वित्तीय बाजार और डॉलर आधारित वैश्विक वित्तीय व्यवस्था तक पहुंच है। मान लीजिए किसी भारतीय बैंक का ईरान से सीधा कारोबार नहीं है। लेकिन वह ऐसी भारतीय कंपनी के भुगतान को प्रोसेस करता है जो ईरान के साथ कारोबार कर रही है। अगर उस बैंक के अमेरिकी कारोबार, डॉलर क्लियरिंग या अमेरिका में ग्राहक हैं तो उस पर अमेरिकी प्रतिबंध का खतरा पैदा हो सकता है।
यही जोखिम बैंकों और वित्तीय संस्थानों को बेहद सतर्क बनाता है। वे अक्सर ऐसे किसी भी कारोबार से दूरी बनाने लगते हैं, जिसका संबंध प्रतिबंधित देश से हो सकता है।
अमेरिका पहले भी सेकेंडरी सैंक्शंस का इस्तेमाल कर चुका है। 2017 में तत्कालीन ट्रंप प्रशासन ने CAATSA कानून के तहत ईरान, रूस और उत्तर कोरिया से जुड़े मामलों में प्रतिबंधों का प्रावधान किया था। इसके तहत 2018 में अमेरिका ने रूस से सैन्य उपकरण खरीदने को लेकर चीन की सेना के एक विभाग पर कार्रवाई की थी। चीन ने रूस से Su-35 लड़ाकू विमान और S-400 मिसाइल सिस्टम खरीदे थे।
2020 में अमेरिका ने रूस से S-400 सिस्टम खरीदने के मामले में तुर्की की रक्षा खरीद एजेंसी और उससे जुड़े अधिकारियों पर भी प्रतिबंध लगाए थे।
अमेरिका की ओर से ईरान पर बढ़ते आर्थिक प्रतिबंधों का असर भारत के कारोबार पर भी पड़ सकता है। ईरान के साथ कारोबार करने वाली भारतीय कंपनियों के लिए भुगतान, बैंकिंग, शिपिंग और इंश्योरेंस से जुड़ी मुश्किलें बढ़ सकती हैं। खासकर चावल, चाय और दूसरे भारतीय उत्पादों के निर्यात पर असर पड़ने का खतरा है।
दूसरी बड़ी चिंता कच्चे तेल की कीमतों को लेकर है। अगर प्रतिबंधों से ईरानी तेल की सप्लाई और घटती है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा हो सकता है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए इसका असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों, परिवहन लागत और महंगाई पर पड़ सकता है। ईरान के साथ भारत के चाबहार पोर्ट से जुड़े कारोबार पर भी अमेरिकी प्रतिबंधों का दबाव बढ़ने की आशंका रहेगी।
इस बार अमेरिकी अभियान का दायरा काफी बड़ा बताया जा रहा है। वॉशिंगटन ईरान की तेल बिक्री समेत उसके राजस्व के दूसरे स्रोतों को निशाना बना रहा है। बेसेंट ने कहा है कि अमेरिका का लक्ष्य ईरान की अर्थव्यवस्था को चलाने वाली हर महत्वपूर्ण आर्थिक कड़ी को कमजोर करना है। इसके लिए ईरान के साथ कारोबार करने वाले देशों और कंपनियों पर भी दबाव बनाया जा रहा है।
अमेरिका ने ईरान से जुड़े करीब 60 व्यक्तियों, कंपनियों और जहाजों पर भी नए प्रतिबंध लगाए हैं। इसके अलावा तेल, क्रिप्टोकरेंसी, टेक्नोलॉजी, सोना, एविएशन और शिपिंग जैसे क्षेत्रों से जुड़ी गतिविधियों को भी निशाना बनाया गया है।
ईरान का कारोबार कई देशों के साथ है। उसके प्रमुख निर्यात बाजारों में चीन, इराक, संयुक्त अरब अमीरात, तुर्की और अफगानिस्तान शामिल हैं। वहीं, ईरान के प्रमुख आयात साझेदारों में यूएई, चीन, तुर्की, यूरोपीय संघ और भारत शामिल हैं। यही वजह है कि अमेरिकी सेकेंडरी सैंक्शंस की धमकी का असर सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं होगा।
अमेरिकी रणनीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती चीन है। चीन ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में ईरान से समुद्र के रास्ते भेजे गए तेल का करीब 80 फीसदी चीन ने खरीदा था। चीन की अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था पर निर्भरता कुछ दूसरे देशों की तुलना में कम है। ऐसे में अमेरिकी सेकेंडरी सैंक्शंस के जरिए चीन पर दबाव बनाना आसान नहीं होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका ने चीनी बैंकों को बड़े पैमाने पर निशाना बनाया तो बीजिंग जवाबी कार्रवाई कर सकता है। चीन ने पहले ही ईरान के साथ अपने कारोबारी संबंधों में अमेरिकी दखल का विरोध किया है।
यही इस रणनीति की सबसे बड़ी परीक्षा है। अमेरिका के पास वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में मजबूत प्रभाव है। इसलिए कई देश और कंपनियां अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने के लिए ईरान के साथ कारोबार सीमित कर सकती हैं। लेकिन चीन और रूस जैसे देशों के मामले में स्थिति अलग है। उनकी अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था पर निर्भरता कुछ क्षेत्रों में कम है। इसलिए इन देशों पर दबाव डालना अमेरिका के लिए ज्यादा मुश्किल हो सकता है।
फिलहाल ट्रंप प्रशासन की रणनीति साफ है। ईरान पर सीधे आर्थिक दबाव के साथ उसके कारोबारी साझेदारों को भी विकल्प चुनने के लिए मजबूर करना। यही 'सेकेंडरी सैंक्शंस' का मूल मकसद है।
Updated on:
26 Aug 2026 03:32 pm
Published on:
26 Aug 2026 03:25 pm
