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चीन से जुड़ने की कीमत चुका रहा नेपाल? जिस हाईवे को बताया दोस्ती की मिसाल, वही बना तबाही की वजह

Flood Update: नेपाल और चीन को जोड़ने वाला हाईवे भीषण बाढ़ में बह गया। भारत से दूरी और चीन से नजदीकी की कीमत अब नेपाल चुका रहा है। पढ़ें पूरी खबर...
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भारत

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Pratiksha Gupta

Aug 31, 2026

Nepal China Connectivity, Himalayan Floods

बाढ़ में बह गया नेपाल-चीन को जोड़ने वाला 800 KM लंबा हाईवे (फोटो सोर्स: @airnewsalerts)

Nepal Flood: भूगोल को नजरअंदाज करने की भारी कीमत चुकानी पड़ती है और नेपाल इस समय इसी कड़वे सच का सामना कर रहा है। भारत पर अपनी निर्भरता कम करने और चीन के करीब जाने की होड़ में नेपाल ने जिस 800 किलोमीटर लंबे चीन-नेपाल फ्रेंडशिप हाईवे को अपनी सबसे बड़ी कामयाबी बताया था, वही आज उसके लिए तबाही की वजह बन गया है। हाल ही में 26 अगस्त को आई भीषण आपदा ने इस पूरे इलाके में भारी तबाही मचाई है, जिससे नेपाल और चीन को जोड़ने वाला हाईवे पूरी तरह ध्वस्त हो गया है।

मिनटों में बहे पुल और बंदरगाह

26 अगस्त को आई अचानक बाढ़ और हिमस्खलन ने नेपाल-चीन सीमा से सटे इलाकों में भारी तबाही मचाई। ग्लेशियर टूटने और भूस्खलन के कारण हालात इतने बिगड़ गए कि चीन का 'ग्यिरोंग पोर्ट' और नेपाल का 'रसुवागढ़ी ड्राई पोर्ट' पूरी तरह तबाह हो गए। नेपाल की तरफ बेट्रावती से रसुवागढ़ी सीमा तक जाने वाली लगभग 42 किलोमीटर लंबी सड़क का नामोनिशान मिट गया और कई मुख्य ढह गए। जिस रास्ते से नेपाल अपने व्यापार को बढ़ाने के सपने देख रहा था, वह रास्ता एक ही झटके में बंद हो गया।

भारत का आसान रास्ता छोड़ चीन की मुश्किल दीवार को चुना

नेपाल के नेता अपनी आर्थिक और व्यापारिक निर्भरता के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराते रहे हैं। लेकिन वे यह भूल गए कि भारत के साथ नेपाल का भूगोल और सामाजिक संबंध कुदरती रूप से बहुत सरल हैं। भारत और नेपाल के बीच मैदानी और सुगम रास्ते हैं, जहां व्यापार और आवाजाही बिना किसी प्राकृतिक चुनौती के होती है।
वहीं दूसरी तरफ, नेपाल और चीन के बीच हिमालय पर्वत एक बहुत बड़ी दीवार की तरह खड़ा है। चीन से जुड़ने के लिए नेपाल ने दुनिया के सबसे खतरनाक और नाजुक पहाड़ी इलाकों में रास्ते बनाने शुरू कर दिए। बेहद कमजोर पहाड़ियों को काटकर और डायनामाइट से विस्फोट करके सड़कें चौड़ी की गईं, जिससे पहाड़ों का संतुलन बिगड़ गया।

वैज्ञानिकों की चेतावनी को किया नजरअंदाज

यह तबाही कोई अचानक हुआ हादसा नहीं है। वर्ष 2024 में आए एक वैज्ञानिक अध्ययन में चेतावनी दी गई थी कि चीन-नेपाल रास्ते के आसपास 2,688 ग्लेशियर झीलें मौजूद हैं। इनमें से कई झीलें कभी भी फट सकती थी।
अध्ययन के मॉडल में साफ कहा गया था कि यदि कोई बड़ी ग्लेशियर झील फटती है, तो 103 किलोमीटर लंबा हाईवे, 103 पुल, 2 बड़े ड्राई पोर्ट और 3,000 से अधिक इमारतें इसकी चपेट में आ जाएंगी। इसके बावजूद इन चेतावनियों को अनदेखा करके वहां निर्माण कार्य जारी रखा गया।

क्या इंसानी गलतियों ने बढ़ाई तबाही?

हालांकि 26 अगस्त की आपदा की मुख्य वजह जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियर का फटना थी, लेकिन नुकसान का दायरा इतना बड़ा इंसानी दखल के कारण हुआ। नाजुक पहाड़ों को काटकर हाईवे बनाना, सुरंगें खोदना और हाइड्रो प्रोजेक्ट्स तैयार करने से पहाड़ों की पकड़ कमजोर हो गई। विशेषज्ञों का मानना है कि इंसान तेजी से उन इलाकों में अपनी बस्तियां और बुनियादी ढांचा बना रहा है, जहां प्रकृति की संरचना पहले से ही अस्थिर है। चीन से जुड़ने का जो दांव नेपाल ने भारत के खिलाफ खेला था, वही दांव अब उसके आर्थिक और पर्यावरणीय भविष्य पर भारी पड़ता दिख रहा है।

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