
नेपाल बाढ़ में अपनों के शव नहीं मिलने पर कुश घास से पुतला बनाकर किया अंतिम संस्कार / फोटो सोर्स- X(@santoshyadavnp)
Funeral in Nepal: प्राकृतिक आपदाएं जब तबाही मचाती हैं, तो अपने पीछे केवल तबाही के निशान ही नहीं, बल्कि अपनों को खोने का ऐसा दर्द भी छोड़ जाती हैं। नेपाल में हाल ही में आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन ने भारी तबाही मचाई है। इस त्रासदी में दर्जनों लोगों की जान चली गई, लेकिन सबसे बड़ा दर्द उन परिवारों का है जिनके अपनों के शव तक नहीं मिल पा रहे हैं।
हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार न होने तक परिवार पर 'सूतक' लगा रहता है, जिससे कोई भी धार्मिक या शुभ कार्य नहीं हो सकता। ऐसे में सवाल उठता है कि जब अपनों की देह ही न मिले, तो अंतिम संस्कार कैसे होगा? इस संकट की घड़ी में नेपाल के पशुपति आर्यघाट पर लोग एक प्राचीन पौराणिक परंपरा का सहारा ले रहे हैं कुश घास से पुतला बनाकर अंतिम संस्कार (पुत्तल दाह) करना।
हिंदू धर्म के 16 संस्कारों में 'अंत्येष्टि' (अंतिम संस्कार) सबसे अंतिम और महत्वपूर्ण माना गया है। गरुड़ पुराण के प्रेतकल्प (अध्याय 10) में स्पष्ट उल्लेख है कि यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु विदेश में, किसी बीहड़ जंगल में, बाढ़-आपदा में या दुर्घटनावश हो जाए और उसका पार्थिव शरीर प्राप्त न हो सके, तो क्या करना चाहिए।
शास्त्रों के अनुसार, ऐसी स्थिति में 'दर्भाकुश' (कुश की पवित्र घास) का इस्तेमाल करके मृतक का एक प्रतीकात्मक पुतला (पुत्तल) बनाया जाता है। इसके बाद वैदिक मंत्रोच्चार के साथ इस पुतले को ही शव मानकर अग्नि दी जाती है। इस प्रक्रिया को 'पुत्तल दाह' या 'तृणपिंड दाह' कहते हैं।
इस प्रक्रिया के पूरे होते ही उसी दिन से दशगात्र, पिंडदान और तेरहवीं की धार्मिक क्रियाएं शुरू हो जाती हैं। तेरहवीं पूरी होने के बाद घर की शुद्धि हो जाती है और सूतक समाप्त मान लिया जाता है।
सनातन परंपरा में बिना देह के मुक्ति का उदाहरण रामायण काल और पौराणिक कथाओं में भी मिलता है। भगवान श्रीराम के पूर्वज राजा सगर के 60 हजार पुत्र महर्षि कपिल के श्राप से भस्म हो गए थे और उनके शरीर पूरी तरह नष्ट हो गए थे। लंबे समय तक उनकी आत्मा की मुक्ति अटकी रही। जब राजा भगीरथ अथक तपस्या करके मां गंगा को धरती पर लाए, तब गंगाजल के स्पर्श से सगरपुत्रों की आत्मा को मोक्ष मिला था। यही कारण है कि आज भी जब शरीर न मिले, तो कुश के पुतले की भस्म को गंगाजल में विसर्जित कर मोक्ष की प्रार्थना की जाती है।
नेपाल में आई भीषण बाढ़ में कई लोग बह गए और हफ्तों बीत जाने के बाद भी उनके शव नहीं मिले। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बिना अंतिम संस्कार के मृतक की आत्मा भटकती रहती है और परिवार का सूतक खत्म नहीं होता। इसी धार्मिक संकट का समाधान निकालने के लिए बागमती नदी के तट पर काठमांडू के पशुपति आर्यघाट में पीड़ित परिवार गरुड़ पुराण के इसी विधान को अपनाकर अपने परिजनों को अंतिम विदाई दे रहे हैं।
Updated on:
03 Sept 2026 09:55 am
Published on:
03 Sept 2026 09:46 am
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