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जहां आतंकवाद के खिलाफ कानून ही बना बहस की वजह, पाकिस्तान की व्यवस्था पर उठे सवाल

पाकिस्तान में सोहेल अफरीदी समेत विपक्षी नेताओं पर आतंकवाद से जुड़े मामलों और मानवाधिकार वकीलों की सजा को लेकर सवाल उठे हैं। जानें रिपोर्ट में क्या दावे किए गए हैं।
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भारत

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Anurag Animesh

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Updated: 30 Oct 2026, 1:00 AM IST

Asim Munir news

पाकिस्तान आर्मी चीफ आसिम मुनीर(फोटो-IANS)

Pakistan Anti Terrorism Law: पाकिस्तान में आतंकवाद विरोधी कानून के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठाए गए हैं। एक रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि देश में विपक्षी नेताओं, राजनीतिक हस्तियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ आतंकवाद विरोधी कानून के तहत मामले दर्ज किए जा रहे हैं, जबकि प्रतिबंधित आतंकी संगठनों से जुड़े कुछ लोग सार्वजनिक सभाएं करने और भाषण देने में सक्षम हैं। रिपोर्ट में पाकिस्तान की सैन्य व्यवस्था, राजनीतिक हस्तक्षेप और आतंकवाद से निपटने की नीति पर भी सवाल उठाए गए हैं।रिपोर्ट में खैबर पख्तूनख्वा के मुख्यमंत्री सोहेल अफरीदी का नाम आतंकवाद विरोधी मामले में शामिल किए जाने का जिक्र करते हुए कहा गया है कि विपक्षी नेताओं के खिलाफ कानूनी कार्रवाई को लेकर राजनीतिक टकराव बढ़ रहा है।

सोहेल अफरीदी समेत पीटीआई नेताओं पर मामला


पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के मुख्यमंत्री सोहेल अफरीदी का नाम रेडियो पाकिस्तान पर 9 मई 2023 को हुए हमले से जुड़े मामले में शामिल किया गया है। डॉन की 29 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, आतंकवाद निरोधक अदालत ने अफरीदी और चार अन्य पीटीआई नेताओं के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किए हैं। यह मामला पाकिस्तान में विपक्षी नेताओं के खिलाफ आतंकवाद विरोधी कानून के इस्तेमाल पर जारी बहस के बीच सामने आया है। हालांकि, किसी मामले में नाम आने या आरोप लगाए जाने का मतलब दोष साबित होना नहीं है।

इमरान खान और नवाज शरीफ का भी रिपोर्ट में जिक्र


पीजे मीडिया में तुर्की मूल की पत्रकार उज़ाय बुलुत की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पाकिस्तान में आतंकवाद विरोधी कानून का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ भी किया जाता रहा है। रिपोर्ट में पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के मामलों का जिक्र किया गया है। इसमें पूर्व सैन्य शासक परवेज मुशर्रफ का भी जिक्र है।

रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान में आतंकवाद विरोधी कानून में कई बार संशोधन किए गए हैं। आलोचकों का कहना है कि कानून की व्यापक परिभाषाओं और पुलिस को मिली शक्तियों के कारण इसका इस्तेमाल वकीलों, नेताओं और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ भी हो सकता है।

मानवाधिकार वकीलों इमान मजारी और हादी चट्ठा को 10 साल की सजा


पाकिस्तान में मानवाधिकार वकील इमान ज़ैनब मजारी-हज़ीर और उनके पति हादी अली चट्ठा के मामले ने भी इस बहस को तेज किया है। 29 अक्टूबर 2026 को पाकिस्तान की आतंकवाद निरोधक अदालत ने सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े एक अलग मामले में दोनों को 10-10 साल की जेल की सजा सुनाई। यह मामला 2024 में एक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट टीम की सुरक्षा के लिए लगाए गए सड़क अवरोधकों को हटाने के आरोप से जुड़ा है। दोनों ने आरोपों से इनकार किया है।

इससे पहले, जनवरी 2026 में सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़े एक अलग मामले में दोनों को 17-17 साल की सजा सुनाई गई थी। सितंबर में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले में उनकी सजा निलंबित कर दी थी और उन्हें राहत दी थी, लेकिन उसी दिन उन्हें दूसरे मामले में फिर हिरासत में ले लिया गया। एमनेस्टी इंटरनेशनल और संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने इन मामलों को लेकर निष्पक्ष सुनवाई और मानवाधिकारों पर चिंता जताई है।

टीएलपी और आतंकी संगठनों को लेकर भी उठाए सवाल


पीजे मीडिया की रिपोर्ट में तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (टीएलपी) के साथ सरकार के व्यवहार का भी उल्लेख है। रिपोर्ट के अनुसार, फ्रांस में चार्ली हेब्दो के कार्टून दोबारा प्रकाशित होने के बाद 2020 में टीएलपी समर्थकों ने प्रदर्शन किए थे। बाद में संगठन और सरकार के बीच समझौते के बाद प्रदर्शन समाप्त हुए।

रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि पाकिस्तान में कट्टरपंथी समूहों के दबाव में सरकार कई बार पीछे हटी है। इसमें लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज सईद का भी जिक्र है, जो विभिन्न मौकों पर हिरासत में लिए जाने के बाद अदालतों से राहत पाता रहा है। ये आरोप और निष्कर्ष रिपोर्ट के लेखक के हैं, इन्हें सभी मामलों के स्वतंत्र न्यायिक निष्कर्ष के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए।

पाकिस्तान की सेना की भूमिका पर भी सवाल


रिपोर्ट में पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था में सेना की भूमिका को एक बड़ी समस्या बताया गया है। लेखक का आरोप है कि देश की राष्ट्रीय नीतियों पर निर्वाचित सरकार के मुकाबले सैन्य प्रतिष्ठान का ज्यादा प्रभाव रहता है। रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान की आतंकवाद नीति में कुछ समूहों को देश के भीतर सुरक्षा के लिए खतरा माना जाता है, जबकि भारत के खिलाफ गतिविधियों में शामिल समूहों के प्रति अलग रवैया अपनाने के आरोप लगते रहे हैं। इस दोहरे रवैये को लेकर पाकिस्तान की नीति पर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं।

रिपोर्ट का मुख्य तर्क यह है कि आतंकवाद से निपटने के लिए बनाए गए कानूनों का इस्तेमाल राजनीतिक विरोध को दबाने के लिए नहीं होना चाहिए। साथ ही, आतंकी गतिविधियों में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए कानून का निष्पक्ष और समान रूप से लागू होना जरूरी है।