
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग कजान में। (फाइल फोटो: MEA/DD)
Galwan Valley Clash Anniversary: छह साल पहले भारत और चीन के बीच गलवान में हुए संघर्ष की बरसी के मौके पर अगर पीछे मुड़ कर देखें तो दोनों देशों के रिश्तों से संबंधित अतीत की कई बातें याद आती हैं ।भारत और चीन के रिश्ते बरसों से तनाव भरे रहे हैं। पहले प्रधानमंत्री नेहरू के समय शुरू में रिश्तों में मधुरता रही और हिंदी चीनी भाई-भाई का नारा गूंजा, लेकिन भारत-चीन जंग भी हुई। भारत के डॉ कोटनीस ने चीन में सेवा की मिसाल कायम की तो कभी मानसरोवर तीर्थ, अरुणाचल प्रदेश और तिब्बत को लेकर दोनों देशों में तनाव के हालात बने।
चीन भारत के दुश्मन पाकिस्तान का अधिक नजदीकी देश है और आपरेशन सिंदूर के समय उसका यह रुख साफ तौर पर देखा गया था। चीन का मामला यह रहा है कि वह पहले चिकोटी काटता है, परेशान करता है, कभी सीमा से आगे आ जाता है, कभी भारत के प्रदेश के हिस्से अपने नक्शे में दिखाता है। ऐसा करने के बाद वह प्रतिक्रिया देखता है कि देखें भारत क्या करता है। गलवान संघर्ष पर रिटायर्ड जनरल नरवणे का बयान भी चर्चित रहा।
चीन समय-समय पर अरुणाचल प्रदेश के उन स्थानों को मंदारिन नाम देता रहता है, जिन्हें वह दक्षिण तिब्बत (ज़ांगनान) कहता है। भारत ने बार-बार दोहराया है कि सीमा दोनों पड़ोसी देशों के बीच प्रमुख मुद्दा है, वहीं चीन ने जानबूझकर इसे कम महत्व दिया है। इन्हीं हालात के अभी छह साल पहले भारत और चीन के बीच गलवान संघर्ष हुआ, जिससे दोनों देशों के रिश्तों में कड़वाहट आ गई।
ध्यान रहे कि छह साल पहले, 15 जून 2020 को, भारत और चीन के सैनिकों के बीच लद्दाख के गलवान में खूनी संघर्ष हुआ था। यह 1962 की जंग के बाद दोनों देशों के बीच सबसे खतरनाक खूनी संघर्ष था। इस संघर्ष में भारतीय सेना के 20 जवान शहीद हुए थे, जबकि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी को भी भारी नुकसान हुआ, हालांकि उसने आधिकारिक तौर पर केवल चार सैनिकों के मारे जाने का दावा किया था। तब भारत और चीन के रिश्ते कमजोर हुए थे।
उल्लेखनीय है कि पीएलए मई 2020 की शुरुआत से ही पूर्वी लद्दाख के चुशुल और डेपसांग सेक्टरों में वास्तविक नियंत्रण रेखा की स्थिति को एकतरफा रूप से बदलने के लिए चीन बड़े पैमाने पर अतिक्रमण कर रहा था। यह वही चुशुल है, जहां हुई जंग में हमारे देश के जांबाज मेजर शैतानसिंह शहीद हुए थे। यहां तो मामला ही दूसरा था। चीन की ओर से किसी उकसावे बगैर की गई इस दुश्मनी भरी कार्रवाई से भारत को गहरा सदमा पहुचा और खासकर तब जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग 2018 में वुहान और 2019 में मामल्लापुरम में हुई बैठकों के माध्यम से रिश्तों में मधुरता की गर्माहट लाने की कोशिश कर रहे थे।
भारतीय सेना ने जवाबी कार्रवाई करते हुए यथास्थिति बहाल करने के लिए एक मजबूत जवाबी तैनाती की रणनीति अपनाई।
हालात सामान्य करने के लिए सैन्य स्तर की वार्ता ठप पड़ गई, क्योंकि चीनी पक्ष पीछे हटने के लिए तैयार नहीं था। इसके बाद भारतीय सेना ने अगस्त 2020 में रणनीतिक कैलाश पर्वतमाला पर कब्जा किया, जिससे चुशुल सेक्टर में चीन कमजोर हो गया। इससे पीएलए को पीछे हटने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
अहम बात यह है कि राजनयिक और राजनीतिक स्तर पर कई बैठकों के बाद, चुशुल सेक्टर में सैन्य वापसी पूरी हुई। देपसांग क्षेत्र में चीन के जिद्दी रवैये के कारण लंबे समय तक गतिरोध बना रहा। आखिरकार सितंबर 2024 में कज़ान (रूस) में मोदी-शी जिनपिंग की मुलाकात के बाद इस गतिरोध का समाधान हुआ। आज लद्दाख क्षेत्र में दोनों पक्षों की ओर से लगभग 50,000 सैनिक तैनात हैं।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार शी जिनपिंग के व्यक्तिगत निर्देश पर तिब्बत को एक ढाल में बदल दिया गया है। उन्होंने 2021 और 2025 में ल्हासा का दौरा किया था। आधुनिक गांवों (शियाओकांग) परियोजना के तहत 720 गांवों का निर्माण किया गया है, जिनमें से लगभग एक तिहाई एलएसी के पास स्थित है। बेहतर 'नागरिक-सैन्य' समन्वय सुनिश्चित करने के लिए 2021 में एक 'नया रक्षा कानून' लागू किया गया था। एक साल बाद सीमा निर्धारण और कब्जे वाले क्षेत्रों पर नियंत्रण मजबूत करने के उद्देश्य से 'सीमा रक्षा कानून' पारित किया गया।
इंडियन एक्सप्रेस में दिए गए भारतीय जनरल उपेंद्र द्विवेदी के बयान के अनुसार, एलएसी पर स्थिति 'स्थिर लेकिन संवेदनशील' बनी हुई है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में एलएसी की स्थिति में काफी बदलाव आया है। लद्दाख में गश्त प्रोटोकॉल में एक बुनियादी बदलाव आया है। पहले, दोनों पक्ष निर्धारित गश्ती बिंदुओं तक गश्त करते थे, जिनकी संख्या 1 से 65 तक थी, जो एलएसी को परिभाषित करते थे। जब मैं इन क्षेत्रों में तैनात था, तब भी इस प्रक्रिया का कड़ाई से पालन किया जाता था। चीन ने एलएसी के साथ-साथ सैन्य बुनियादी ढांचे का बड़े पैमाने पर विकसित किया है। इसमें पैंगोंग त्सो झील पर पुल, अक्साई चिन से होकर गुजरने वाला दूसरा राजमार्ग जी 695, ल्हासा-निंगची रेलवे लाइन और तिब्बत हवाई अड्डे का विकास शामिल है, साथ ही जे-20 स्टील्थ लड़ाकू जेट सहित अतिरिक्त हवाई संपत्तियों की तैनाती भी की गई है।
सेना का कहना है कि यह है कि उस समय घुसपैठ को देखते हुए यह साफ लग रहा था कि गलवान ऑपरेशन को शी जिनपिंग की अध्यक्षता वाली सर्वोच्च रक्षा संस्था, केंद्रीय सैन्य आयोग (सीएमसी) की मंजूरी प्राप्त थी। समय बीता और हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन यात्रा से तनाव भरे रिश्तों पर शांति की बर्फ नजर आने लगी, जिससे अमेरिकी प्रेसीडेंट डोनाल्ड ट्रंप भी असहज दिखे। आजादी के बाद देखें तो नेहरू से मोदी तक इन रिश्तों में कई उतार चढ़ाव देखे गए।
Updated on:
15 Jun 2026 01:09 pm
Published on:
15 Jun 2026 01:08 pm
